Sunday, 30 July 2017

मोह बांध रहा और मोहब्बत बैचेन कर रही

बस की खिड़की पर मौसम की नमी जमती जाती है। सड़क पर कितना अंधेरा है और इस अंधेरे को चीरते बस भागी जाती है मन के अंधेरे को धोते हुए। कैसे रात कटे और सुबह हो। उस शहर में सुबह जिससे मैंने जी भरकर नफरत की और उसी शहर के लिए इतना इंतज़ार। डर जाता हूं कि बारिश हो रही होगी तो? कैसे समझाऊंगा खुदको। पिछली बार कितना कोसा था बारिश को। उस दिन ज्यों-ज्यों दिन गुजर रहा था ऐसे लगता जैसे सबकुछ डूब रहा हो। दीवार में दुबके कबूतर को घंटों देखता रहा भीगते हुए। वो पंख फड़फड़ाकर उड़ता और बूँदें उसे वापिस उसी जगह बैठा देती । और मौसम साफ होने पर भी घर से निकलना ना हुआ तो? मेरी बैचेनियों को कौन हाथ थाम ले जाएगा।

कैसे चहकता सा दौड़ रहा था तीन महीनों से छूटी गलियों में दौड़ते हुए। सब चेहरों को देखने की ठाने मन इंतज़ार कर रहा था आने वाली ट्रेनों का। ट्रेनें जो घाटों और रेगिस्तान के शहरों से, रोज कोसने के बावजूद इस कभी ना छूटने वाले शहर को आती हैं। और इंतज़ार खत्म हुआ तो सुबह आई संदेश ले कोई बुरा। चुप सन्न सा मन सब कुछ समेट कर भागना चाहने लगा। क्या बोलूं। लेक्चर दे दूं? पर लेक्चर देने से नफरत है। खुद को कितना बुरा लगता है जब अपनी बात कहकर किसी के चेहरे पर चुप्पी पढ़ना चाहो और वो शब्दों की चाशनी से शरीर को ऐंठ दे। चाही गई एक चुप्पी को छोड़कर सब दे देने वालों पर कोफ़्त होती है। मैं चुप रहा। ऐसे मन के साथ कोई सुनने के लिए कुछ नहीं कहता बस सामने वाला समझ रहा है इसके लिए कहता है। मन भाग रहा पर पाँव बँधे हैं। मोह बांध रहा और मोहब्बत बैचेन कर रही। हरे रास्तों पर खुद को भिगोकर बैचेनियों को डुबो देने की हद तक भीगता रहा खुद को हँसाते हुए।





बैचेनियाँ डूबने लगी तो शरीर बीमार पड़ गया। अपने शहर से जो कशीदे समेटे थे यों ही बिखरे रह गए। कशीदे उनके लिए जिन्हें देखकर शरीर काम्पता। उनसे कितना दूर रखा खुद को। शायद खुद को किसी के लिए बचाकर रखने के मोह में पास आने की कोशिशों को रोके रखा। हाँ भी तब करता जब लगता कि अब अंधेरा सारे दरवाजे बंद कर चुका है। तब चिढ़ाने के लिए हरियल रास्तों के सपने दिखाता। तड़प को मार दिया था किसी की और अब कशीदे देकर खुद उस गिल्ट से मुक्त होने का सामान इकट्ठा करता था। कम से कम अब इतनी दूरियाँ थीं कि पास आने का कोई सीधा रास्ता बचानहीं रह गया था।
सुबह बस की खिड़की पर धुंध छंटी तो बौछारों में भीगते हुए हँस रहा था। दिन कैसे कटता। भाग गया दूर किसी दमक में। बैचेनियाँ काट लेने भर के लिए। कोई फिर पकड़ कर ले आए उन रास्तों पर जिनसे मोहब्बत हो गई। वो जगहें जैसे दरवाज़े बंद कर रही हों। और फिर शाम आती है तो लगता है जैसे खुद के होने को कहीं छोड़ दिया। सिर्फ चेहरा है और आवाज़। कोई कुछ भी नहीं। ज़ी करता है आँखें बंद करके सुनता जाऊं। परदा जो दिखा रहा है दिमाग उसके साथ-साथ दृश्यों में घुलकर कहीं और चला जाता है।



तीन बरस पहले किसी शाम सपना देखते हुए कैसे एक नाम अटक गया था। वो नाम जो जन्म देने वाली मिट्टी में घुला हुआ था। शाम भर तस्वीरें देखता रहा। नज़दीक आने के रास्तों पर चलता गया। और रास्ते छोटे होते गए। चाह की पगडंडियों पर बाधाएँ आती गईं और नजदीकियों के रास्ते पास आते गए। इतने पास आते गए कि खुद के ना होने पर भी होंठ नाम लेते रहते। इतनी नज़दीकियाँ कि जिस शहर को जी भर कोसा वो शहर प्यार हो गया। और फिर लगता कि मुझे ही कोई मुझसे छीन रहा हो। भागते पेड़ों के बीच जैसे मैं बिखरकर इधर-उधर गिर रहा होऊं। कितने नाम हैं जाने-पहचाने कि जिन के साथ दिन सुहाने और रातें रंगीन होती हैं। डर लग रहा है सबसे। जवाब देते नहीं बनता कि मैं हूं इस शहर में।

बस पड़े रहना चाहता हूं उन दो चेहरों के पास जो गोद में खेलते हुए चेहरे बने हैं। वो कुछ भी नहीं पूछते इस सवाल के अलावा कि आप भूखे तो नहीं। मैं हँस देता हूँ जवाब देते हुए, मुझे कब भूख लगती है। रात होते-होते बैचेनियाँ पाँवों में नाचने लगती है। मैं स्टेशन मास्टर के कमरे के आगे रखी कुर्सी पर बैठे सिगरेट के धूँए के पटरियों की तरफ जाते हुए देखता रहता हूं। फाटक बंद होता है तो पैदल चलने वाले थोड़ा सा झुकते हैं और निकल जाते हैं, जो सवार होते हैं इंतज़ार करते रहते हैं रास्ता खुलने का। खत्म हो चुकी सिगरेट को देखकर दूसरी सिगरेट जेब से बाहर आ जाती है। आस या पास कुछ भी नहीं जो जला दे इसे। नीचे पड़ा सिगरेट चमकता है और झुककर दूसरी सिगरेट को चूम लेता है। महीनों पहले कि वो रात जाने कहां से उतर आती है पटरियों पर झूलती हुई। पिगलती बरफ के बीच नशे में झूमते शरीर ने चिपके होठों को दूर करते हुए चाह की थी कि ये भारीपन ना होता तो गले पर प्यारा नीला रंग उभर आता। नशे में ही उसने एक नाम लिया कि ये नीलापन उस पर कितना फबेगा।

पागल हो गया था मन उस रात। दूर अँधेरे में पिघलते हुए पहाड़ को देखते हुए वो रातभर बालकनी पर सिगरेटें झाड़ता रहा। ये नाम क्यों लिया उसने, क्या माथे पर लिखा रह जाता है ज़ेहन में अटका रह गया नाम। नाम ने उतार दिया सारा नशा जो नशे को को काटने के लिए नसों में घुला था। खुद को बचाने के लिए लकीर खींच दी उस रात और भाग आया था फिर किसी के पास आने को नकारकर।

बंद दुकान की सीढ़ीयों के नीचे से सिर निकालकर कुत्ता अजीब सा लुक दे रहा है। सड़क पर ठहरे रह गए पानी में रोडलाइट ऐसे चमक रही है जैसे पूरा चाँद हो। सुनहरी रेखा तक खत्म हो चुकी सिगरेट ने होंठों को जला दिया। पानी में झांकते चाँद के छलावे पर सिगरेट फेंकी तो छप्प की आवाज के साथ चाँद गड्डमड्ड हो गया। बुझा हुआ सिगरेट का टुकड़ा पानी पर तैर रहा है। मन नहीं समझता समझाने पर भी। ऐसे कैसे लौटा जा सकता है। मैं सोचता हूं कि मेरा होना जरूरी है।

कानों में चित्रा सिंह घुलती जाती हैं बैचेनियों में तैरते हुए-

उन के खत की आरज़ू है उन के आमद का ख़याल 
किस क़दर फैला हुआ है कारोबार-ए-इंतज़ार




Saturday, 15 July 2017

समय गठरी होता ना तो बांधकर लाद देते कांधे पर

भीगने के लिए जरूरी थोड़ी होता है कि खूब बारिशें हों। हल्की-हल्की बौछारें भी तो कभी-कभी भिगो देती हैं गहराई तक। काँच के दरवाजे को किसी उम्मीद से हल्का सा धकेलते हुए अंदर पैर रखते हैं तो कमीज पर मंडी बूँदों को देखकर कोई पूछे कि तुम तो भीग गए। तो चेहरे पर मुस्कराहट तैर जाती है, हां मैं भीग गया पूरा।
बैठते हुए आँखें देखी और भीगते-भीगते डूब गया। कुर्सियों के चारों तरफ कितना कुछ मांडा हुआ था। सबमें दिख क्या रहा था वही ना जो देखना था। जो भिगा रहा था। और देखते हुए माथे पर क्या महसूस हो रहा था, बरगद पर से अटकी हुई बूंदें झरकर माथे पर गिर रही हों जैसे।

नदियाँ कितनी दूरी तय करती हैं ना। भीगने के लिए दूरियां क्यों आड़े आएंगी। नदियाँ तो बारिशें नहीं होती ना। बारिशें कभी-कभी मुँह फेर लेती हैं। लेकिन नदियाँ जब भी बहती सब कुछ भिगोते हुए चलती। सड़क के किनारे उन चार पीले पत्थरों के पीछे की जमीन जब भीगती तो कैसे सबकुछ हरा-हरा हो जाता। उन पत्थरों के पास से गुजरती हवा में कैसी नमी होती है। हवा भी नम होती है क्या दुःखांत कहानियों के लिए और वो भी सालों बाद तक। पर नमी में जाने कौनसा सुकून है जो हर वक्त भिगोता रहता है। उन कहानियों का प्रेम शायद हवा में घुला रहा गया था बरसों बाद भी।

जैसे भीगना बचा रह जाता है सालों-साल तक। उजाला खत्म होता है और अंधेरा हँसने लगता है। भीगने की महक कुरदने लगती है कुछ घंटों बाद ही। समय गठरी होता ना तो बांधकर लाद देते कांधे पर और छिड़कते रहते हर महक के साथ छींटे बालों में।

हैरानियाँ होती हैं ना यूँ भीगने पर। कि सब बुनते होंगे कहानियाँ और हँसते होंगे। पर भीगने का जो सुख होता है वो अंधा होता है अगर अंधा नहीं भी होता है तो बन जाता है। सोते-सोते करवट बदलकर बालों में हाथ फिराओ तो भीगने की महक फैल जाती है। होंठों पर हंसी तैर जाती है। और खिड़की से लगता है हवा का झोंका आया हो कोई किसी चश़्मे को छूकर। किसी ज़ादूई चश़्मे को छूकर। ज़ादूई 🌿

Friday, 19 May 2017

बुलबुल तिल ढूंढ के दो ना

बरस चले जाते थे और दिन लौट आते। दिनों के लौट आने पर दिख जाते थे वो शब्द जो बरसों के चले जाने पर रह गए थे ड्राफ्ट में। ड्राफ्ट जाने कितनी कहानियों को छुपाए रखते हैं।
किसी के ब्लॉग पर कई ड्राफ्ट पड़े थे खाली, जिनके सिर्फ टाइटल लिखे थे। और हर टाइटल के साथ लिख रखा था नाम। जैसे एक टाइटल ये था 'बुलबुल तिल ढूंढ के दो ना'।
बुलबुल क्यों तिल ढू्ढ के देगी। ये उन बरसों के दिन थे जब वो अजीब से सपने देखकर जाग जाता था। एक नाम गूंजता था सपने में, एक तिल दिखता था और बरगद पर उड़ती रहती थी बुलबुल। एक दिन उसे लगा सपना सच हो गया।
उसने लिखा "वह सोचता है कि जिस दिन रेगिस्तान से उसका प्यार गलत साबित हो जायेगा उस दिन उसकी सच्चाई के सारे माले ध्वस्त हो जायेंगे। और सब मालों के नीचे दबी कराह रही होगी उसकी आत्मा। पर वह जानता है कि किसी भी कीमत पर उसकी आत्मा एवं रेगिस्तान के प्रति प्रेम झूठे नहीं हो सकते।"
वही नाम उसके मन में गूंजा और किसी के दिखने से पहले दिखा तिल चमकता हुआ। प्यारे से होठों और नाक को छिपाता हुआ तिल। वह देखता रहा घंटों तक तिल को। जैसे नशे में था। उसे लगा कि माल फूंक लिया और धीरे-धीरे खुदपर से काबू खोता जा रहा है वो।
उस बरस खूब बारिश हुई रेगिस्तान में। रेत के बीचोबीच पानी उछलता रहता। पंछी आते और गर्दन पानी में डुबाकर पानी उछालते। उसने पंछियों के साथ कूदते हुए पाँव डुबा लिए पानी में और खेजड़ी पर फाख़्ता के जोड़े के पास लहराते सांगरियों के गुच्छे को देखता रहा।
उस बरस हर मौसम वो खुश रहा। हर मौसम कुछ न कुछ सीखता रहा। एक रात तो उसने सोचा कि वो सीख लेगा अंग्रेजी। और कोशिश भी की।
उन सर्दियों वो दही में चूरी बाजरे की रोटी खाते हुए छाजड़े से साफ होते मूंगों को देखता रहता दोपहरों में। वह किताबों के बीच से मुस्कराते हुए झांकता रहता। बारिश के दिनों में उसने ये सारे सपने देखे थे। सर्दियों और गर्मियों में जीता रहा इन सपनों को।
वो शहर में होता तो रेत होता और रेगिस्तान में होता तो भी रेत ही होता। शहर में होकर रेत होना गर्मियों में पत्थर के मकानों के ठंडे होने जितना ही मुश्किल है।
वो दोपहरों में बरगद और बुलबुल से बातें करता रहता। किताबें जो सवाल छोड़तीं उनके जवाब बरगद से मांगता और सवाल सुनकर हंसती रहती बुलबुल।  वो चिढ जाता तो तेज आवाज़ में गाने लगता गीत बेसूरे और गीत सुनकर बरगद बंद कर देता झूमना, बुलबुल भाग जाती कानों पर रखके हाथ। वो हंसने लगता तो बदल जाता मौसम और होने लगती बारिश। बरगद पत्तों पर ठहर गई पानी की बुंदों की ठंड से सिहरने लगता बुलबुल चोंच से पत्तों को झुमाने लगती। वो बरगद के टहनियों पर फेरने लगता हाथ। बुलबुल उसकी अंगुलियों पर चोंच मारकर अठखेलियां करते हुए चूमने लगती। वो हंसते हुए बरगद और बुलबुल से विदा लेता तो दोनों खूब सारी दिखावटी बददुआएं देते।
फिर बदल जाते मौसम। मेट्रो स्टेशन पर छूट रहे होते हाथ। शहर का हर चेहरा जेसे खींच रहा उसके अंदर से सांस। वो तड़पने लगता। वो सवाल पूछने लगता कि रेगिस्तान शहर में आकर रेत छोड़ देता है क्या? रेत के रहते रेगिस्तान झूठा नहीं हो सकता।
वो भाग आता फिर उस जगह जहाँ पाँव डुबोये थे। पसीने से तरबतर। खेजड़ी की सूखी झूलती टहनियों के आगे मैदान में पानी देखकर वो आंखें बंद करके भागने लगता और छलांग लगा देता पाँव डुबाने के लिए। घुटने छिल जाते सूखी मिट्टी में घिसकर। पतली धारों में घुटनों पर से खून निकलने लगता। दूर-दूर तक कोई पंछी नहीं। पानी नहीं मृगमरीचिका थी वो। वो घुटनों के दर्द को दबाते हुए भागकर बरगद और बुलबुल से सवाल करने पहुंच जाता। सूखकर सफेद हो चुका बरगद और चुप्पी ओढे बैठी रोज गाने वाली बुलबुल से वो बेहोश सा पूछता कि प्रेम मृगमरीचिका है क्या? जवाब कुछ नहीं होता दोनों कब के बेहोश हो चुके थे।
टूटते तारों को देखकर वो पागल होने लगता और उस तारे की तरह सब तारों से दूर होने लगता। अपनी दुनिया में। दो मौसमों के लिए उसने खुद के लिए एक अलग दुनिया बना ली। कई मौसमों बाद जब बारिश हुई तो बरगद हरा हो गया और गाने लगी बुलबुल। उसने चुपके से कहा बुलबुल तिल ढूंढ दो ना।
और बुलबुल उसे सपनों में फिर से तिल दिखाती। कभी गले को ढकता तिल तो कभी गालों को ढकता तिल। हर बार तिल देखने के बाद वो घुटनों पर हाथ फेरता जैसे कि खून रिस रहा हो। और वो बेतहाशा चूमने लगता फाख्ता को भूलने के लिए घूटनों को।

•छूटी हुई कहानियां कभी ढंग से पूरी नहीं होती।

आह को चाहिए इक उम्र...


यार ये मई का महिना है

यार ये मई का महिना है
दिन तपते हैं ठरती हैं रातें
 सुबह छत पर मोर नाचते हैं
 दोपहर जाळों के नीचे होती हैं गायें
 शाम को उत्तर से उठता है बवंडर।
 यार ये मई का महिना है
 क्यों कहते निर्मम महिना है
 लू और तपत से जलाने वाला
 पसीने से तरबतर कर देने वाला
 उमस और आंधियों का महिना।
 यार ये मई का महिना है 
 मैंने खिड़की में पाँव रखे थे
 बरगद को छूकर आती हवा
जाळों पर उगे लाल-पीले पीलू
 खेजड़ियों से झड़ते खोखे
 टूळों पर लटकते पाके।
 यार ये मई का महिना है
 ये मेरा महिना है
 मैंने खुद को जलाने की चीजें चुनी नहीं
 ना ही पत्थर चुने और ना ही वायरों का हवा-पानी।
 यार ये मई का महिना है
 कपड़े सिली बोतल का पानी पीना है
 डाखणी खिड़की की हवा में सोना है
 शाम को ठाढकी रेत में फिरना है
 ढळती रात में कांगसिया बजाना है।
 यार ये मई का महिना है
 बोला ना मेरा महिना है...

Tuesday, 16 May 2017

हवा के गीतों पर झूमती गेहूँ की बालियाँ

मुझे कविताएं बहुत पसंद है। और उससे भी ज्यादा पसंद है कविताओं को नए तरीके से पढ़ना। छपी हुई कविताओं को पढ़ने से घटती हुई कविताएं महसूस करना ज्यादा सुखदायी होता है। या फिर पढ़ी जा चुकी कविताओं को ही घटते हुए महसूस करना। जैसे मैं किसी निर्माणाधीन इमारत के पास चला जाता हूं और महसूस करता हूं नरेश अग्रवाल की ये कविता-
"तुम हँसते हुए  
काम पर बढ़ोगे
और देखते ही देखते 
यह हँसी फैल जायेगी 
ईंट-रेत और सीमेंट की बोरियों पर 
जिस पर बैठकर 
हंस रहा होगा तुम्हारा मालिक।"





मैं बैठ जाता हूं किसी छोटी सी रेगिस्तानी पहाड़ी पर जाकर केदारनाथ अग्रवाल की इस कविता को समझने और महसूस करने के लिए-

"जहाँ से चली मैं 
जहाँ को गई मैं- 
शहर, गाँव, बस्ती, 
नदी, रेत, निर्जन, 
हरे खेत, पोखर, 
झुलाती चली मैं। 
झुमाती चली मैं! 
हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूं"।


मैं ऐसे ही सुकून भरी कविताओं को महसूस करने के लिए यात्राएं करने के सपने देखता हूं। कोई चुप्प सी यात्रा। बिना कुछ जाने बिना कुछ किसी से पूछे। ऐसी यात्रा जो सिर्फ मेरी यात्रा हो। मेरे महसूस करने को कोई महसूस न कर पाए ऐसी यात्रा।
पिछले दिनों में हिमाचल में था। मई-जून के महिने में हिमाचल जाने का पहला कारण हर किसी का यही होता है वहाँ ठंडक होती है। मैं समूद्र तल से 230 मीटर ऊंची तपती दोपहरों वाली जगह से ठंडी 2100 मीटर ऊंचाई वाली जगह था। जैसलमेर से धर्मकोट तक कि यात्रा में पठानकोट तक 24 घंटे की यात्रा उंघते हुए बीती। और फिर पठानकोट से निकलते-निकलते आँखें खुलनी शुरू हुई जो खोती गई सुंदर कविताओं में। पतली-पतली सड़कें, दोनों तरफ छोटे-छोटे गेंहूं के खेत, ऊंचे पहाड़। मैंने बहुत सारी कविताओं को महसूस किया इस यात्रा में।




इस यात्रा में जो चीज सबसे अच्छी लगी वो थे गेहूँ के खेत। छोटे-छोटे खेतों में लहराती गेहूं की बालियाँ ऐसे लग रही थीं जैसे हवा के गीतों के साथ नाच रही हों। मैं धरमकोट में जिस कमरे में रुका हुआ था उसके ठीक नीचे एक छोटा सा खेत था जिसकी बालियाँ हवा में लहराती रहती थी। मैं सिगरेट पीने बाहर निकलता तो लम्बी देर तक लोहे की जाली पर हाथ टिकाए सुनहरी बालियों को देखता रहता। सीढ़ीदार खेत बहुत छोटे-छोटे होते हैं। मैं रास्ते भर सोचता रहा कि कितने प्यारे हैं ये खेत, मैं भी घर के पास एक ऐसा छोटा सा खेत बना दूंगा जिसमें हमेशा कुछ उगता रहे।








मक्लिओडगंज के पास एक छोटी सी झील है, डल झील। धर्मकोट से इस झील तक पैदल रास्ता बहुत सुंदर है। घने पेड़ों के बीच से गुजरते हुए महसूस होता है जैसे आँखें बंद किए चल रहे हों। चारों तरफ शांति और पेड़ों के बीच से आती झींगूरों की आवाजें। इस रास्ते के बीच में बताया गया कि बीच में एक जगह पहाड़ी कुत्ते हैं ध्यान रखना। इन पेड़ों के बीच से गुजरते हुए जो महसूस हुआ वह मंगलेश डबराल की इस कविता से समझा जा सकता है-
कुछ देर बाद
शुरू होगी आवाज़ें
पहले एक कुत्ता भूँकेगा पास से
कुछ दूर हिनहिनाएगा घोड़ा
बस्ती के पार सियार बोलेंगे
बीच में कहीं होगा झींगुर का बोलना
पत्तों का हिलना
बीच में कहीं होगा
रास्ते पर किसी का अकेले चलना
इन सबसे बाहर
एक बाघ के डुकरने की आवाज़
होगी मेरे गाँव में।






मैंने सुना था हिमाचल के रास्ते डरावने हैं। मुझे इन रास्तों से गुजरते हुए एक बार भी डर नहीं लगा। छोटे-छोटे रास्ते। उन रास्तों पर से चढ़ती-उतरती गाड़ियाँ, ढलानों पर पशुओं को हांकती लड़कियां, रास्तों से बहुत नीचे बसे गाँव। पहाड़ों पर चढ़ते-उतरते हुए हर बार मुझे आँखों देखी फिल्म याद आती रही। मेरा सत्य वही होगा जिसे मैं महसूस करूंगा, कुछ अनुभव अभी भी बाकि हैं जो कि सिर्फ सपनों में भोगे थे। जैसे कि ये सपना मुझे बार-बार आता था कि मैं हवा में तैर रहा हूं पक्षी के जैसे।






यहाँ के लोग भी मुझे किसी कविता से लगे। चुपचाप पना काम करते हुए। आते-जाते हुए। शायद नई जगह के लोग होने के कारण मुझे ऐसा लग रहा है। सड़क पर गुजरते इस बुजूर्ग की तस्वीर देखिए या खच्चर ले जाते इस आदमी को या फिर इस राहगीर को। मुझे लगा कि से पूछूं कौनसे देश से हो पर फिर मन ने कहा कि तुम बिना सवाल-जवाब कि यात्रा के हो तो पूछा नहीं।












दूर तक ऊंचे-ऊंचे हरे और सफेद पहाड़। ऊपर की चोटियों पर गर्मियों में भी बर्फ दिख रही है। पेड़ों की लम्बी कतारों पर सुबह-शाम सूरज डूबने और उगने के रंग उतरते हैं। किसी कोने में कोई अकेला खड़ा पेड़। शाम को छोटी-छोटी चीजें जब सूरज पीछे चला जाता है तो निखरने लगती हैं।









पराशर झील धर्मशाला से छह घंटे की दूरी पर है मंडी के पास। मुझे इस यात्रा में गेहूँ के खेतों के बाद अगर कोई जगह सबसे अच्छी लगी तो वो थी इस झील के पास एक पहाड़ी। यहाँ पराशर ऋषि का मंदिर है। इस झील के अंदर एक छोटा बगीचा है जो तैरता रहता है। मंदिर में स्थानीय लोगों की भीड़ थी शायद यहाँ पर्यटक बहुत कम ही आते होंगे। मंदिर के आस पास लकड़ी से बहुत ही सुंदर कमरे बने हुए हैं। झील देखने के बाद पास की एक पहाड़ी पर चढ़े।वहां एक तार थी जिसके दूसरी तरफ छोटा सा कमरा दिख रहा था। वहाँ की हवा ऐसी थी कि बैठे रहें बस हिलें ही नहीं। दो पहाड़ियों बीच से आती ठंडी हवा और आसपास दिखते सफेद बर्फ से ढके पहाड़। भेड़ों का हांकता चरवाहा, पहाड़ों के बीच गोते खाते पंछी। मेरे लिए ये जगह बिल्कूल वैसी ही थी कि कुछ अनुभव अभी भी बाकि हैं जो कि सिर्फ सपनों में भोगे थे।

















मैं धरमकोट में रुका था। इसे छोटा इजरायल भी कहते हैं। मकलिओडगंज से थोड़ा सा आगे शांत और छोटा सा गांव है। यहाँ से कांगड़ा वैली और धौलाधर रेंज दिखते हैं। भीड़भाड़ से दूर शांति से रहने के लिए धरमकोट बहुत ही प्यारी जगह है। मैं मिस्टिक लोटस होटल में ठहरा था और इस होटल में ज्यादातर ऐसे लोग थे जो तीन-चार महिनों के लिए यहाँ रुकने आए थे। यहाँ रास्तों में अकेले फिरते हुए ऐसे लगता है जैसे हर चीज कविता कह रही हों। पेड़ों के बीच से रोशनी बिखेरता सूरज, पत्थर पर खिलता अकेला फूल, पास में बैठा उबासी लेता कुत्ता, स्कूल में खेलते हुए थककर सीढ़ियों पर बैठे बच्चे।


















मैं फिर से इन तस्वीरों को देखता हूं तो ऐसे लगता है जैसे मेरे किसी प्रिय कवि की कविताएँ हैं जिन्हें मैं बार-बार पढ़ता हूं। इन सामने घटती कविताओं में सुख है महसूस करने का पास बैठकर।

Saturday, 13 May 2017

बंजारे जी उठे सुनकर कहानियाँ

बंजारे जी जाते थे तपते जेठ के दिनों में जब जाळों पर छाए होते पीलू और खेजड़ियों पर खोखे। पंछी गाते और जिनावर सोते थे। दिनों में जब पेड़ों के नीचे धूप काढ रही होती कशीदे तब पेड़ों की छाँव में कहानियाँ बन जाती थीं औषधियाँ।

तेज धूप जब ढक जाती थी बादलों की छांव में। जब बोलने लगते मोर टहनियों से निकालते हुए कलंगी वाली गर्दनें। जब पेड़ों पर लटक रहे होते पीलू खाते बच्चे। अधेड़ कूट रहे होते पते कोटड़ी में। बकरियां खा रही होती खेजड़ियों के नीचे खोखे। बच्चे ऊंघ रहे होते डाखणी हवा वाली खिड़कियों के नीचे। औरतें बुन रही होती रालियाँ। तब बंजारे पी रहे होते कहानियों की कच्ची शराब।

 जैसे अाज की कहानी, किसी पुजारी के वादे की। कहानी बरसात के मौसम की। कहानी काळ के डर की। जमाने का तीसरा महिना यानि की अगस्त। रूई के फाहों से बादल उपड़ आते दोपहरों में और शाम तक लौट जाते बिन बरसे। आस खो चुके किसान और ग्वाळ कातर नज़रों से हर शाम तकते आसमाँ। रेगिस्तान के अंतिम छोर का कोई गाँव। बरस उन्नीस सौ तिहत्तर, या बंजारों की कहानियों की बोली में कहें तो तीसा यानि विक्रम संवत 2030 के दिन। आईनाथ जी के मंदिर में धूंप जल रहा है, पुजारी जी मंदिर से निकलकर अपने घर जा रहे हैं। पुजारी जी जो गाँव के स्कूल में पढ़ाते भी हैं। गांव के लोग खूब मानते माड़साब्ब को। सुबहों को छाछ दोपहरों को केर-सांगरियाँ और रातों में ठंडे पानी के मटके भरकर गाँव के लोग पैरों पर खड़े रहते हर वक्त माड़साब्ब के लिए।

 एक दिन माड़साब्ब मंदिर से निकले ही थे कि गाँव का एक भील काळ से डरा हुआ पुजारी जी को मिल जाता है, गिड़गिड़ाने लगता है गुस्से में। आप कैसे पुजारी हैं जो बारिश नहीं करवा सकते। बता दीजिए अब कब होगी बारिश। पुजारी जी एकदम से चुप्प। पूजा-पाठ, चौघड़िया-बिघड़िया, मुहूर्त तक तो ठीक है अब बारिश कहां से करवा दें। फिर भी बोल दिया कि कुछ दिन बाद होगी बारिश खूब। तब तक में उपवास रखता हूं। अब माड़साब्ब ने बोल तो दिया पर बारिश कहां से करवाएंगे। आईनाथ जी का भोपा माड़साब्ब के एकदम खास आदमी। माड़साब्ब आप भोपे रा खेळा। आते ही पूछा कि मैंने तो ऐसे बोल दिया बारिश का और रख दिया उपवास अब क्या करें। भोपे ने अगरबत्ती जलाकर आखे लिए और हंसते हुए बोला आज से बारिश होने तक मेरा भी उपवास। और ग्यारहवें दिन बारिश होगी।

 दूसरे दिन तेज धूलभरी आंधी शुरू हो गई। स्कूलों की छुट्टियों के दिन। भोपा और माड़साब्ब दोनों सुबह छाछ पीकर पूरा दिन निकाल देते। आठवां दिन चढते-चढते माड़साब्ब के बीछणी होने लगी बादलों का तो कोई नामोनिशान ही नहीं बारिश कैसे होगी। उतरे चेहरे से भोपे को देखा भोपे ने कहा बारिश होगी चिंता मत करो। ग्यारहवें दिन की दोपहर बीतते-बीतते आंधी रुक गई और उमस होने लगी। ओतरे कूंट में काळ्याण उपड़ने लगी और आंधी के साथ तेज बारिश। तीन घंटे बाद बारिश ज्यों ही रुकी सामने की मकान से दादी हाथ में थाली और छाछ का जग भरे निकली। थाली में केर-सांगरी, फुलके और कोळियो। माड़साब्ब ने हंसते हुए आईनाथ जी को धोक दी और बात रखने के लिए धन्यवाद दिया। भोपा आंखें बंद किए बैठा था। पच्चीसे के काळ से डरे किसान और चरवाहे खुश हो गए थे तीन महिनों बाद।

 कहानी खत्म होते-होते दोपहर खत्म होने को थी। चांरे की खिड़की से आती हवा बंजारे को छूती और बंजारा उंघने लगता। आज कहानी सुनने के लिए बंजारा जाने कितने दिनों बाद जागा था दोपहर में।


Saturday, 29 April 2017

घंटियाँ सिसकती हैं हलों को याद करके

वैशाख महिने के दिन। सुबह के दस बज रहे हैं पर इस वक्त भी धूप तपकर झुलसाने लगी है। एक बड़ा सा हॉल जिसे कोटड़ी कहा जाता है उसमें गाँव के सारे लोग इकट्ठा हैं, एक कोने में चद्दर पर पानी के लोटे के चारों ओर अनाज के छोटे-छोटे ढेर किए हुए हैं। उनके ऊपर प्याज रखे हैं और बीच में पानी का लोटा भरकर रखा हुआ है जिससे टिकाकर रखा है एक आईना। लोगों के चारों तरफ थालियाँ सजी हुई है, जिनमें घी चमक रहा है। पतली-पतली रोटियाँ रखी है जिन्हें यहाँ की स्थानीय बोली में फाफरिया कहा जाता है। रोटियों के ऊपर खूब शक्कर डाली गई है। बड़े बर्तन रखे हैं गुळराब से भरे हुए। रंगीन पगड़ियाँ पहने लोग एक दूसरे को मनुहार कर रहे हैं।



बात हो रही है आखातीज के त्यौहार की, जिसको अक्षय तृतीया भी कहा जाता है। राजस्थान को खूब सारे तीज-त्यौहारों के लिए जाना जाता है। आखातीज पश्चिमी राजस्थान का सबसे बड़ा त्यौहार है। यह त्यौहार किसानों और फसलों से जुड़ा माना जाता है। इन दिनों फसलों की कटाई हो चुकी होती है। ऐसे कहें कि खेत सुनहरे हो चुके होते हैं और किसान गुलाबी। खेत सुनहरे इसलिए की फसल कटाई के बाद खेत तेज धूप में झुलसकर सुनहरे नज़र आते हैं और किसान गुलाबी इसलिए कि फसल बिकने के बाद किसानों के खूंजों में चमक रहे हैं दो हजार के गुलाबी नोट। हालांकि इस बार सूखे के हालात होने के कारण किसान गुलाबी के बजाय डर से पीले हो रखे हैं।



आखातीज का त्यौहार वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। इस दिन को शुभ माना जाता है। यह दिन अबूझ सावे के रूप में भी जाना जाता है। अबूझ सावा यानी बिना पंडित को पूछे भी शुभ कार्य किए जा सकते हैं। इस दिन राजस्थान में सब से ज्यादा शादियाँ होती हैं। इन शादियों में ज्यादातर बालविवाह होते हैं। आखातीज के दिन प्रशासन को बालविवाह रोकने के लिए विशेष तैयारी करनी पड़ती है। प्रदेश की मुख्यमंत्री भी इस त्यौहार की शुभकामनाएँ देने के लिए ट्वीट करती हैं तो वो होता है "आईये, सब मिलकर बाल विवाह की कुरीति को जड़ से मिटायें और हमारी बेटियों के भविष्य को सुरक्षित करें।"
लेकिन सब व्यवस्थाओं के बाद भी सैकड़ों नन्हे-मुन्ने गुड्डे-गुडियों के खेल की तरह शादी के बंधन में बांध दिए जाते हैं।


 आखातीज के त्यौहार की शुरूआत वैशाख शुक्ल तृतीया के कुछ दिन पहले से ही हो जाती है। गाँव के सारे बच्चे एक जगह इकट्ठे होते हैं और रात भर हल जोतते हैं। ये एक खेल की तरह होता है। बड़े हल के जैसे ही लकड़ी के छोटे-छोटे हल होते हैं। बच्चों के हाथों में बैलों के गले में बंधने वाली घंटियाँ होती हैं। एक लड़का हल खींचता है दूसरा लड़का हल को पीछे से चलाते हुए बाजरा या गेंहूं बोता है और तीसरा साथ में घंटी बजाते हुए चलता रहता है। गाँव के रेतीले धोर पर बजती घंटियों की आवाज़ और बच्चों का खिलखिलाहट रातभर पूरे गाँव में घुलते रहते। हल जोतने के बाद वो रातभर खेलते और बातें करते रहते। ऐसा आखातीज वाले दिन तक चलता है।  अमावस्या और दूज के दिन खीच बनाया जाता है। खीच बाजरे से बनाते हैं जिसे घी या कढ़ी के साथ खाया जाता है। बनाने से एक दिन पहले भीगे हुए बाजरे को घर के आंगन में गड़ी हुई पत्थर की ओखली में लकड़ी के मूसल से कूटा जाता है और दूसरे दिन उसे पकाया जाता है।




अमावस्या, दूज और तीज के दिन गाँव के सारे लोग कोटड़ी में इकट्ठे होते हैं और रेवण की जाती है। जब यहाँ पर अफीम का चलन ज्यादा हुआ करता था तब यहाँ पर रेवण में अफीम गलाकर सबको मुट्ठी से पिलाया जाता था और सारे गिले-शिकवे, बैर भाव भुलाए जाते थे। सभी लोग वहीं पर खाना खाते हैं। गाँव के सारे घरों से थालियाँ आती हैं जिसे यहाँ की बोली में तासळा कहा जाता है। अमावस्या और दूज को तासळे में खीच और घी के साथ कढ़ी होती है और तीज के दिन गुळराब, घी, फाफरिये, केर-सांगरी और कई दूसरी सब्जियों के साथ तली हुई ग्वारफलियाँ और अंकुरित बाजरा और मूंग ले आते हैं। हर घर के आंगन में अनाज रखा जाता है। जिसमें बाजरा, मूंग, गेंहू और चने होते हैं।


 इस दिन मौसम का भी पुर्वानुमान लगाया जाता है। शगुन देखे जाते हैं कि आने वाले मौसम में सुकाल रहेगा या अकाल। इसके लिए हर जगह अलग-अलग तरीका अपनाया जाता है। एक तरीका ये है मिट्टी के प्याले बनाए जाते है जिनमें पानी भरा जाता है और उन प्यालों के नाम महिनों के नाम पर रखे जाते हैं और फिर उनके फूटने का इंतजार किया जाता है। जो प्याला पहले टूट जाता है उस महिने माना जाता है कि अच्छी बारिश होगी। माने की खेत भर जाएंगे बारिश के पानी से। अकाल सुकाल का पता लगाने के लिए काले और सफेद रंग के दो रुई के फाहे लेकर पानी पर रखते हैं अगर काला रूई का फाहा पहले डूब जाता है तो माना जाता है कि इस बरस सुकाल रहेगा क्यों कि अकाल डूब गया है। अब चीजें बदलने लगी हैं। त्यौहार बस नाम भर के रह गए हैं। आज ही रेवण में किसी बुजूर्ग ने कहा "पहले थालियाँ बड़ी होती थी और वो किनारों तक खीच और घी से भरी रहती थी अब थालियाँ भी छोटी हो गई और उनमें खीच भी कम। रात भर हम हल जोतते थे, खेलते थे। अब तो बस बच्चे बस तृतीया के दिन देखने को मिलते हैं। हल और घंटियों को तो भूल ही गए हैं।"  पुराने दिनों का भी कैसा नॉस्टेल्जिया है। खत्म हो रही चीजें अजीब तरीके से लुभाती हैं। लगता है कि कितने बेहतरीन हुआ करते थे वो दिन।

Wednesday, 26 April 2017

था जो खो गया, तेरी अँखियों का अनुरागी

सामने एक लड़का बैठा है जमीन पर, शायद बस के चलने का इंतज़ार कर रहा है। कितना खुश है सामने बैठे दोस्तों से बातें कर रहा है, तैयारी कर रहा होगा कुछ बनने के लिए और घर लौट रहा है।
मन है ना कितना अजीब है। बहुत सपने देखता है। चीज़ों को अपने हिसाब से डिसाइड करता है। ऐसे होगा वैसे होगा और जो हो रहा होता है वो मन का नहीं होता तो भागता है। जैसे बादलों को देखकर मैं पागल हो जाता हूं। आज कितने बादल हैं ना ऊपर। ऐसे लग रहा जैसे मुझे कोई बांध रहा है और मैं भाग रहा हूं रस्सी तोड़कर।
जगहें अपने आप में सुंदर होती हैं क्या या किसी के साथ होने से वो सुंदर हो जाती हैं? मुझे तीन साल तक जयपुर नरक लगता रहा और पिछले एक साल से मैं जयपुर के प्यार में हूं। मैं किसी के साथ उन जगहों पर गया जहाँ उन तीन सालों में नहीं गया था। मुझे लगा इन जगहों को नहीं देखा इसलिए जयपुर नरक लगता रहा। आज मैं अकेले उन सारी जगहों पर गया। लेकिन मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा। जैसा किसी के साथ उन जगहों पर होने पर लगा था।
दोस्त कहते हैं कि खुद से प्यार करो। खुद की खुशियाँ खुद में ही हैं फिर मुझे खुद से, अकेले जाने पर ये जगहें क्यों अच्छी नहीं लगी? मैं तो खुद से प्यार भी करने लगा हूं अब।
क्या हर कोई खुद में खोकर खुश रह सकता है? कभी जब सबकुछ खाली-खाली सा लग रहा हो। मन डूब रहा हो तब सबसे बात करने पर भी वैसे ही लगता रहता है। लेकिन कुछ लोग होते हैं गिने-चुने, ज़िंदगी में। उनसे बात करके ऐसे क्यों लगता है कि सबकुछ सही हो गया है। नहीं पता कि मन ऐसी धारणा बना लेता है या सच में वो लोग ही सुकून होते हैं। पर उनसे बात करते हुए ऐसे लगता है जैसे खुद से प्यार हो रहा है। अपनी हर चीज़ सुंदर लगने लगती है, अपनी लम्बी सी नाक, छोटे-छोटे दु:ख सब कुछ।
यही है बस इसी से भागता हूं, इसी से रुकता हूं और इसी में जीना चाहता हूं। और कुछ भी चाहना नहीं।
मैं तो हूं हमेशा, अभी के लिए था जो खो गया, तेरी अँखियों का अनुरागी।

Wednesday, 22 March 2017

आती भी कहाँ है अब नींद

 रेडियो जाने के दिनों की वो रातें थीं। छत पर आसमान होता था और हल्की सी राली और पतला पथरना। तकिये के एक कोने पर रेडियो गीत गाता था। फोन होता नहीं था तो देखने को थे तारे और रात में खुद को छिपाता बरगद। दस बजते-बजते रेडियो पे कुछ भी बचता नहीं था बजने को। ये वक्त होता था रात के अंतिम प्रसारण के खत्म होने से एक घंटा पहले का। खत्म हो रहा होता था गोरबंद, धीमे होते ढोलक और खड़ताल की आवाज़ के साथ। रेडियो बंद होता था शुरू हो जाते बरगद के पत्ते। दिन भर धूल से टकराती थकी हवा सहला रही होती पत्तों की नसों को। पानी की टंकी के पास बिखरे पानी में छोटे जिनावर गा रहे होते, जैसे वो जानते हों कि अब हो गया है वक्त मेरे सोने का। और ग्वाला भी जानता कि मैं क्या सुनकर सोऊंगा चैन से। इसीलिए उसने बांध दी थी बकरियों के गले में घंटियाँ। और रात में जब भी खुलती नींद ऊंघती बकरियों के गले में बज रही होती घंटियाँ हल्के-हल्के।और फिर किन्ही शामों में आ गया फोन। इन दिनों जितना बुरा नहीं था वो। बड़ा काम आता था उस वक्त जब रेडियो के पास कुछ भी नहीं बचता बजने को। मैं दो-तीन पसंदीदा ब्लॉगों को पढ़ने के बाद खोल लेता कॉफी हाउस। और लगता जैसे कोई हवा का झोंका बरगद के पत्तों से निकलकर छू गया हो। मुझे नहीं पता था कि मैं जिनकी कहानियाँ सुन रहा था इस पते पर लोग पागलों की तरह दीवाने होते हैं उनके, जैसे मैं हो गया था उस सुनाने वाली आवाज़ का। यहीं सुनी थी मैंने कुर्रतुन एन हैदर की कहानी 'फोटोग्राफर', अमृता प्रीतम की कहानी 'एक जीवी, एक रत्‍नी, एक सपना', गैब्रिेएल गार्सिया मार्खेज़ की कहानी 'गाँव में कुछ बुरा होने वाला है' ऐसी और भी कई कहानियाँ। इंतज़ार रहता था रात का। ये आवाज़ लोरी की तरह हो हई थी। बिना सुने नींद ही नहीं आती थी। वैसे ही जैसे इन दिनों से कुछ वक्त पहले तक माँ की बाजू पर सिर रखे बिना सो नहीं पाता था। गर्मियों की रातों में दिन भर की तपन को रेत जब छिपा लेती और हवा गर्मी को जाने कौन से कोने में छुपा आती, मैं कोई कहानी प्ले कर देता और एक आवाज़ आती 'कहानियों के वाचन का ब्लॉग, कॉफी हाउस। यू. आर. एल. कथा डेस पाठ डॉट ब्लॉगस्पोट डॉट इन।' ऐसे लगता जैसे किसी ने बालों में हाथ फिरा दिया हो। कहानियाँ लगाकर सो जाता और यूनुस खान की आवाज़ ऐसे लगती जैसे कोई लोरी गा रहा हो। रोज़ रात को कहानियाँ सुनता और लगता कि ये सिर्फ मेरे लिए ही बोली जाती हैं। क्यों कि कहीं पर मैं नहीं देखता था इन मिश्री जैसी कहानियों का ज़िक्र। मैं कभी शेयर नहीं करता था, किसी को बताता भी नहीं था इस ब्लॉग के बारे में। ऐसे लगता कि ये प्यारी आवाज़ और इन कहानियों पर सिर्फ मेरा ही हक़ हैं। इन्हें किसी और को नहीं पढ़ने दूंगा। और फिर पता नहीं कैसे वो सारे ब्लॉग, वो सारी कहानियाँ, वो सुकून सब छूट सा गया। ऐसे ही कभी सोचा करता था कि माँ से दूर होऊंगा तो उसकी बांह के बिना नींद कैसे आएगी। आती भी कहाँ है अब नींद। कल कविताओं मैं वो आवाज़ फिर से सुनी तो कलाई पर रोओं को नाचते देखा। ऐसे लगा कविताओं को निकालकर रख लूं जेब में और सुनाऊं हर सुकून को।

Monday, 20 March 2017

खेजड़ी, खड़ताल और बंजारे



बंजारे परीक्षाएँ देते थे हदों की। प्रेमिकाओं ने कभी परिणाम नहीं जारी किये।

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सर्द दोपहरों को बंजारें काचरी-धनिया की चटनी लसाड़ते और फूंकते जाते थे चिलमें।

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गिलहरी फुदकती और कौवे के मुँह से हड्डी छूट जाती। बंजारे मूच्छें पकड़कर हंसने लगते।

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सर्द रातों में बंजारे चिलमें ओढ़ते थे। सुबह पेड़ से गिरती ओस की बूँदें जब पिंडलियों को छूकर बर्फ बना देतीं तब उनके दिमागों से उतरते थे प्रेमिकाओं के चेहरे।

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बंजारे गीली धरती पर पाँवों को भिगोते निकल पड़ते अलसुबह चाय के लिए दूध ले आने को। गवाड़ी पहुंचकर ठिठूरते बदन को गिरा देते चरवाहे की खाट के सहारे और बकरियों की घंटियां बजने तक तापते रहते अलाव।
सामने बाख फूटने की दिशा से सूखी टहनियों पर बोलती फाख़्ताओं की आवाज़ को समझ लेते थे वो प्रेमिकाओं के गीत और अफीम के नशे में खोए से पड़े रहते। बकरी के बच्चे जब चबाने लगते अंगूठों को तो अचानक से चौंककर उठते और खूंटे पर टंगी दूध की केतली उठाकर भागने लगते डेरों की ओर।

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बंजारे सुनाते थे कहानियाँ। वो कहानियाँ जो पत्थरों में गड़ी हैं।

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बंजारे के रुदन पर बकरियाँ गाती थीं। तालाबों के किनारे बेर रेत में मिल जाते खारी बूँदों जैसे।

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बंजारे राजपूतों के बरामदों में सामान फैलाकर खुद को भूल जाते थे। बरामदों के फर्श पर कचकोळियाँ खिलखिलाती थीं कलाइयों को देखकर।


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बंजारे कभी नहीं बोले। बरामदे तरस जाते कचकोळियों की खनखनाहट को। कलाइयों के निशान मिटने तक फिर से बस जाते थे बंजारों के डेरे।

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बंजारे दोस्ती गांठते थे ओठारों से। ऊंटनियों का दूध पीते तारों की छाँव में। सुबहों को तेखले खुलने पर जिस ऊंटनी का दूध बंजारे पीते वो पार हो जाने को दौड़ती सीमाओं के। ओठारों को संदेश आते सीमाओं के पार से। तीसरी शाम ऊंटनी तेखले में तड़फड़ाती।

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और बंजारे आग में फूँक मारते चिलम के खीरे चुनते और खुद को सुलगाते रहते। बंचारे फिर चले जाएंगे? लौट के आएंगे?
ऊंटनियों के तेखले आधी रात को टूट जायेंगे? अमावस के अंधेरे में वो रेत के समंदर में घुस जायेंगी?
ओठार समाचार लाया कि रेत के बीचो बीच आक के फूलों से ढकी एक बंजारे की लाश पड़ी है।
रात में गायें भड़क गईं। कुत्ते चिल्लाये। बिल्लियाँ लड़ने लगी। सुबह राजपूतों के बरामदे में छातियाँ पिट रही थी। तालाब की पाल पर पोतिये दिखते थे। बेरों के बीच कचकोळियाँ बिखरी थी। पानी पर कलाई तैर रही थी।
पागी पैर ढूंढते थे तालाब और आक के पौधे के बीच।

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बंजारे वादा करते खुद से कि बोलेंगे तो बखाण करेंगे अच्छों के, शाम होते-होते लौट आते दिल का गुबार निकाल।
और कहते देर से आना और काम करना अलग-अलग चीजें हैं।

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बाबा ने बंजारे से कहा मिरगानेणियाँ मृगमरीचिकाएँ होती हैं। बंजारा मारा-मारा जो फिरा आठों दिन।

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बंजारे उदास शामों में कुमार गन्धर्व को सुनते और खो जाते।

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बंजारे श्रापित थे। जिन बातों के लिए रात में हँसते सुबह वही बातें रुला जातीं।

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बाबा ने बंजारे को एक सलाह दी थी, कहा कि इसे अपने पोतिये के पल्ले बांध लो। इकाई के पहले पाँच अंको में दोस्त बनाना और प्यार जानवरों से करना। बंजारा पहले दो तीन अंकों तक पहूंचा है। जानवर रेगिस्तान में छूट गए। शहर में बिल्लियाँ पालने वाले घर मिलते नहीं।

* * *

बंजारे गधों का मेला घूमकर लौटते और अनपढ़ हो जाते। बंजारे को अपने गधे याद हो आए जो खाना मिल जाने पर आराम नहीं मांगते थे। डेरे के नासमझ लड़के गधे को सूखी लकड़ी चुभाकर गडी देते और वो दौड़ने लगता। बाबा ने कहा था गधे या तो काम करते हैं या मर जाते हैं।

* * *

अपना देश छोड़ चुके बंजारे फिरते-फिरते जंगलों और पर्वतों के बीच ऐसे लोगों से मिलते थे कि उन्हें अंधेरे जमाने याद आ जाते।
उन्हें लगता कि रेत के बीच किसी ढ़ाणी के किनारे तारों की छाँव में नानी की गोद में सिर रखे ऊंघ रहे हैं।
और घुल रही होती है सुकून भरी कहानियाँ धूल से लिपटी हवाओं में।
हवाएं गाती थीं 'सैणां रा बायरिया धीमो रे मधरो बाज'।
बंजारे सालों बाद फिर खुश हो जाते थे।

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बंजारों के गीतों में अंधेरे उजाले हुआ करते थे। इन गीतों में थीं नानी की कहानियाँ, तारों की छाँव, ऊंटों के टोले, रेत का राग, चरवाहे का सुकून, पगडंडियों के निशान।
बंजारे तेज धूप में कपड़ा सिली बोतल को रेत में गाड़कर ऊंघते थे खेजड़ी के छाँव में। खेजड़ी पर बैठे पँछी उनको गीत सुनाते थे सपनों में।
बंजारे जब जागते थे ऊंट झाड़ रहे होते थे खेजड़ी से खोखे। बंजारे खोखे खाते और पानी पीकर चल देते।

* * *

बंजारे कभी-कभी खो जाते थे। खुद से बहुत दूर चले जाते। चाहने वाले उन्हें फिर से ले आने को सलाहें देते। कहते कि बंजारे रेत के वासी हैं उन्हें रेत से सीखना चाहिए।
रेत को जितना पकड़ने की कोशिश करते हैं उतनी ही वो हथेली से सरकती जाती हैं।
बंजारे हँसते और पागल हो जाते। कहते, बंजारे रेत हथेलियों में थोड़ी पकड़ते हैं। वो रेत में समाए रहते हैं। रेत में जीते हैं। रेत-राग सुनते हैं। रेत को छूते ही वो जी जाते हैं। रेत उन्हें खुद के होने का एहसास करवाती है।
बंजारे जब खुद में होते तो शामों को आकों की टहनियों पर झूलते रंगों भरे सूरज की छाँव में बकरी के बच्चों के साथ नाचते रहते। खड़ताल बजाते और गोधुलि में लौटते हुए पँछियों के रैलों को निहारते रहते।
घरों को लौटते पँछी कितने प्यारे दीखते हैं। 🌿

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बंजारों को खेजड़ी की छाँव बहुत भाती। वो गाँव के किनारों पर ढ़ूंढ़ते खेजड़ी के पेड़ और उनके नीचे सुस्ताते रहते। बंजारों के दोस्त भी इन खेजड़ी के रूंखों जैसे होते। वो उन्हें सिखाते ना होने वाली चीज़ों के लिए रोने के बजाय हो रही चीज़ों के लिए खुश होना।
सर्द दोपहरों में बंजारे घरों के आगे सूरज को छूते ओटों पर आकर बैठ जाते और तासली में चाय ठारते हुए सुनाते कहानियाँ। बंजारें गाँवों के लिए सुख होते हैं। वो एक गाँव में कहानियाँ ढ़ूंढ़ते और दूसरे गाँव के ओटों पर उन कहानियों को उड़ेल देते।
बंजारा एक दिन गाँव में एक बूढ़े और बच्चे से मिला। बच्चे को आदमी चिढ़ाते थे कि तुम्हारी माँ भाग गई किसी और के साथ। बच्चा कुछ देर के लिए रूआंसा हो जाता और फिर बावळों की तरह उनके साथ खेलने लगता।
बूढ़े के पीछे बच्चे भागते और पूछते, डोकरे तेरी शादी कब होगी। बूढ़ा गुस्सा होकर उनके पीछे भागता और थोड़ा भागने के बाद गुस्सा भूलकर उन बच्चों के साथ खेलने लगता।
उस रात बंजारे को बहुत देर बाद नींद आई। ढ़ाणी के आगे कम्बल में दुबका वो कच्ची शराब के नशे में रात भर चिल्लाता रहा,
होवे तो होये बणजारो
नीतो होये कामणगारो
घणो रे प्यारो ए जमारो..

* * *

और बंजारे सीखते थे मरने को भी जीना।
(Akira Kurosawa की Dreams देखते हुए)

* * *

सालों बाद बंजारे पुरानी जगहों पर वापिस लौटते। वहाँ पर अपने बनाए चिन्हों में बदलाव करते। कुछ देर उन बदले हुए चिन्हों के लिए रोते और फिर जोर-जोर से हंसते हुए चलने लगते।
बंजारे गाते थे कि हम नहीं नापते पाँव, मिली रे हमको काजळिए री छाँव।

* * *

बंजारे वावळे होकर दौड़ते रहते। लगता जैसे चिलम के नशे में रहने वाले बंजारों के पैरों में अचानक से कोई चक्कर बंध गया हो।
और फिर कहीं किसी जगह चुपचाप आँखों में देखते हुए बैठ जाते वो। ठहरकर खो जाते वो। खोये तो वो दौड़ते हुए भी रहते। जाने क्या कहाँ छोड़ आते खुद ही नहीं समझ पाते थे।
रंग समेटते सूरज की छाँव में पत्थरों पर बैठे निहारते रहते फूल। वो रोने को होते फिर बातें सुनते और रोक लेते आंसू।
जाने क्यूं बंजारों को सूखे काले पेड़ों पर रंगों के बादल उकेरती शामों से इतना लगाव है?

* * *

बंजारों गुजरे दिनों में फिर से झांकते। दिनों को जैसे सांगरियों की तरह छत पर सूखने के लिए फैला रखा हो। कोई पंछी आता और उठाकर फिर से दिखा जाता।
बंजारे आँखों में देखते, फिर गुजरे दिनों को याद करने लगते। चारों आँखों में जैसे वही एक सा दीख रहा हो।
बंजारे बाबा की कहानियों के बारे में सोचते। बाबा कहते थे कि 'कोई शक्ति है जो हमें आपस में जोड़ती है। जन्मों के कोई रिश्ते होते हैं। हमें कई बार ये महसूस भी होता।' बंजारा चीज़ों को तौलता और उसे लगता कि बाबा सच कहते थे।
ऐसे क्यों एक सा घटता है?

* * *

बंजारे बहुत कम झगड़ते थे। झगड़ते थे तो शामों को रेडियो का चैनल बदलने पर। कुछ बंजारे बाहर की हवा से गुजरकर आते और सुनना चाहते गीतों के बजाय खबरें। खबरें सुनने वालों को रोक लेती थीं बंजारों की छोटी बच्चियाँ। जिन दिनों बच्चियाँ रखती मिनीमारो उस दिन चल जाती थीं खबरें। और खबरें सुनते ही उजड़ जाते थे बंजारों के डेरे।
बंजारे खबरों में सुनते थे नई योजनाओं के बारे में। वो चक्कर लगाने लगते दफ्तरों के। योजना के तीन हिस्से के पैसे लुटाकर वो प्राप्त करते चौथा हिस्सा।
चौथे हिस्से की अंग्रेजी शराब खरीदते। चिलमें और कच्ची शराब के नशे में रहने वाले बंजारे अंग्रेजी शराब पाकर पागल हो जाते। डेरों में कुत्तों के चिल्लाने की आवाज़ें बढ़ जाती। पँछी चुप हो जाते। मुर्गे सहम जाते।
रात के अंतिम पहर में बंजारे कपड़े फाड़ने लगते और अंत में डेरे में आग लगा देते।
अगले मौसम तक फिर से गाँवों के ओटे सूने हो जाते। कहानियाँ चुप्प हो जाती। बंजारों के पीछे फिरने वाले बच्चे घरों में खो जाते।
बूढ़ी औरतें इंतज़ार करती मौसम बदलने का। जवां कलाइयां दोपहरों में उदास हो जातीं देखकर बेरंग कचकोळियाँ।
और फिर किसी मौसम पेड़ों की छाँव में फिर से गाने लगती बंजारों की बच्चियां। चिळकने लगती हवेलियों की कलाईयाँ।

* * *

बंजारे जहाँ सांस छोड़ते वहाँ उग आते थे पत्थर जो अकेले मुस्कराते रहते रेतराग सुनकर।

* * *

बंजारों के डेरों के बरक्स बनती जाती ऊँची-ऊँची मंजिलें। बंजारे डर जाते। लगता कि वो छूट रहे हैं दुनिया से पीछे। फिर वो देखते मंजिलों में फेम के लिए मरते लोगों के, एक-दुसरे के चेहरों से पाखंड नोंचते लोगों को, पचासों झूठों से एक बात कहते लोगों को। वो और घबरा जाते।
फिर अचानक से कोई आता और डेरे में दीया जलाकर सुनाता कहानियाँ। बंजारे के डेरे में कहानियाँ भर जाती। बंजारा घंटों सुनता रहता चुपचाप।
वो अट्टालिकाओं में चेहरा नोंचते मानसिक दिवालियों की ओर देखता और हँसने लगता जोर से।
वो जब भी बोलता, उसके मुँह से कहानी के अंत में सुनाई गई बात निकलती 'चश्मा उतारकर देखें तो दुनिया कितनी खूबसूरत है'।
बेचारे फेम के भूखे पाखंडी।

* * *

बंजारे सुंदर आत्माओं में घुल जाते और डेरे बदलने की सारी उदासियाँ महीनों के लिए रेत में घुलकर सुकून हो जाती।

* * *

बंजारे अंधेरे में चुपचाप घंटों चलते रहते। घुप्प अंधेरे में उन्हें सबसे रोशन जहां दिखता था। बदलते मौसम के दिनों तारों भरे आसमान के नीचे सोये-सोये वो घंटों सुनते रहते सुकून भरे गीत। बकरियों के गले की घंटियों और जिनावरियों की आवाज़ में घुलती हवा बंजारों के उलझे बालों में घुलती रहती और वो रेत के बीच किसी छोटी सी पहाड़ी पर चिलम फूंकते हुए पा जाते खुदको।

* * *

बंजारे पहाड़ी पर सारा दिन मोरचंग बजाते रहते और काट देते थे बखत। दिनों बाद कोई उनसे पूछता कि क्या भागना गुनाह नहीं? और वो चिलम के कपड़े को किनारे से लपेटते हुए कहते, रुककर कौनसा तखत बदलेंगे। ये तो तमाशा है और हम ना तमाशा करने वालों में हैं ना तमाशा देखने वालों में।
और फिर किसी सुकून वाली जगह से गुजरते हुए गाने लगते, ना सूझे रे शबद कोई जी चाहे देखूं टुकूर।

* * *

बंजारे क्यों मर गए?
मांगणियार गाते मीठा थे। उनके नाम का मतलब था- मांगने वाले। मांगते तो सब है फिर वो ही क्यों मांगणियार। बंजारों के यार हुए मांगणियार। बंजारे कहानियाँ थे और मांगणियार किरदार।
वो गाते तो मिश्री हो जाते और काम करते तो गधे। वो खेतों में होते तो उनके सिर पर गठरियाँ होती और चौखट पर होते तो हाथ में ढोलक।
बंजारे जान गए कि उनके सिर पर जो गठरी है वो माथा तपा देती है, चोखट पर गाते हैं गले की नसें बोल जाती हैं।
बंजारे चुहल करते थे, खींच लेते कपड़ा जब गठरी होती सिर पर। हंसा देते जब वो गा रहे होते विदाई गीत।
बंजारे अजब थे, लाडले भी। वो कटती फसल के वक्त खेजड़ी की ठंडी छाँव में ऊंघते। चूरमा खाते, रेत में गड़े बर्तन से छाछ पाते और फिर ऊंघते।
जब चौखट पर हो रही होती बातें वो खड़ताल बजाते। ढोलक पर थाप देकर भाग जाते।
बंजारे मर गए, जादूगर के तोते की तरह उनकी जान थी खड़ताल की ताल में खेजड़ी की छाँव में।



Saturday, 11 March 2017

सुमेरिंग घरां ना जाव धूधी ऐ बोले छे

धी रात बीत चुकी है। बत्ती बंद हो गई है। और जब बत्ती बंद होती है तो सारे रंग छुप जाते हैं बचते हैं तो सिर्फ दो रंग, काला और सफेद। काला रंग रात का और सफेद रंग खिड़की से आती स्ट्रीट लाइट का। मैं आँखें बंद करके वापिस खोलता हूं और कोशिश करता हूं कुछ और रंग ढूंढ़ने की। तब उभरने लगते हैं कुछ और रंग। सफेद सिगरेट के अंतिम सिरे पर चमकती एक सुनहरी लाइन, चमकती और मद्धिम होती लाल रंग की रोशनी और फर्श पर गिरते राख के कण। गाने बज रहे हैं, वही तेज आवाज़ में जो सैटरडे नाइट को बजते हैं।
बत्ती बुझने से कुछ देर पहले एक फोन आया था, उस फोन में मुझे ऐसे लगा जैसे बात करने वाला रेल में है। छुक-छुक की आवाज़ आ रही थी। मैं सही से बात नहीं कर पाया। शायद बात कर सकने की हालत में नहीं था। उसने कहा मैं कोटड़ी(जगह जहाँ गाँव के लोग किसी मेहमान के आने या त्यौहार पर इकट्ठे होते हैं) में बैठा हूं। फोन कटने के बाद याद आया वो आवाज़ रेल की नहीं था,  ढोल पर चींपे देने की आवाज़ आ रही थी।
मैं रंग क्यों खोज रहा था? क्यों कि होली है। होली से सात दिन पहले होळके लगते हैं और उन सातों दिन गाँव के सारे लड़के इकट्ठे होते हैं रात में। रात भर ढोल बजाते हैं। घूमते-फिरते हैं। खेलते हैं। इन दिनों खेतों में चने की फसल लहलहा रही होती है।
कुछ साल पहले जब मैं अभी से थोड़ा और छोटा था रात में ढोल बजाने के बादल हम निकल जाते थे खेतों की ओर। पास के गाँव के खड़ीन में होळे खाने। अंधेरे में किसी के खेत में चोरी करने। दस-बारह जने होते थे हम। तीन-चार जने खेत में घुसते बाकि लोग किसी एक जगह बैठ जाते और होळे तोड़ कर ले आते। बहुत बड़े खेत में रात में कोई एक जना होता जो खेत की रखवाली कर रहा होता। खेत में हरकत होती देखकर उसको लगता कि जानवर घुस गया है खेत में, वो अपनी तेज रोशनी वाली टॉर्च की रोशनी हमारी ओर करता और हम सांस रोककर फसल में छुप जाते।



बाहों में चने के झाड़
भरे लौटते और छीना-झपटी करके खाने लगते। एक जना खींप इकट्ठे करता और फिर उनको जलाकर होळे सेककर खाते। जाती हुई सर्दी के दिनों में हाथ तपते उस आग में तब तक उंगलियों काली करते रहते जब तक चने आँखों को दिखते।


और दूसरी सुबह कोटड़ी में गाँव का कोई बड़ा आदमी पूछ रहा होता कि रात को पड़ोस के गाँव के खेत में चने कौन तोड़ आया। जो भी थे वो थे पक्का अपने गाँव के और हम सब एक-दूसरे को देखते हुए मुस्कराते रहते।
होळकों की रातों में जब तक ढोल बजता तब तक गाँव की औरतें एक ओटे पर इकट्ठे होकर गालियाँ गाती हैं। ढोल से निकलकर कोई घर लौट रहा होता तो उसको गाली गातीं। एक जो मुझे याद है वो सुमेरिंग ऐ घरां नां जाव धूधी ऐ बोले छे। हम बहुत छोटे थे तब वो जिस ओटे पर गीत गातीं उससे लगते घर की छत पर चढ़कर पानी की बाल्टी उन औरतों पर उड़ेल देते। और फिर वो नेंवजण(बकरी के बालों या कपड़े की बनी रस्सी) लेकर पानी डालने वालों को मारने दौड़तीं।
ढोल बज रहा होता तब वहां बीस-पच्चीस लोग इकट्ठे होते थे। टाबर, मोटियार, बुजूर्ग सब। और जब सब मगन होते ढोल की आवाज़ में, बातों में, बीड़ीयों के धूएँ में। अचानक से पीठ पर नेवजण की मार शुरू हो जाती। और सब भागने लगते। और पीछे भाग रही होती औरतें नेवजण घुमाती हुई। बाद में पता चलता कि वो कोई हममें से ही था जो औरतों के कपड़े पहन कर आया था। और सब हंसने लगते, अपनी-अपनी पीठ पर नेंवजण की चोट से मंडे निशान दिखाते हुए।
ये दिन स्कूलों में परीक्षा के होते। पर सब भूल जाते थे परीक्षाओं को। डांट खाकर शाम में खाने के बाद हाथ में किताबें लेकर बैठते, लेकिन मौका लगते ही छू हो जाते। और जाळ की पतली काचकी टहनियों को टटोलकर चींपें बनाकर ले आते और ढोल के पास बैठकर चींपें देने की बारी का इंतजार करने लगते।



एक टोली इकट्ठी होकर पास की रेत में कूद जाती और फिर शुरू होता खेल गावड़ी और सेल का। आपस में झगड़ने का।
होली वाली शाम तो बिना रंगों के ही रंगीन हो जाती। शाम को बड़े लड़के इकट्ठे होकर जाते और सूखे खींप और चग्गों की होली बनाते। एक होती होली और दूसरा प्रहलाद। प्रहलाद के प्रतीक रूप में जाल के पेड़ की एक हरी डाल गाड़ते उसमें।
हर घर में गेरूं और कली के बने चौक चमकने लगते ढूंढ के इंतजार में। सारे बच्चे चिल्लाते-गाते हर घर जाते। चौक में घर का सबसे छोटा बच्चा बैठता। वहां पर आक की लकड़ी के बने डांडिये उठाकर सारे उन्हें बजाते हुए गाने लगते आडो पाडो उडो उडो, युवराजियो उडो उडो। किसी घर में सबसे छोटा बच्चा अगर थोड़ा बड़ा होता तो उसके दोस्त बीच में वो लकड़ियाँ उसके सिर पर ही मारने लगते। और वो बाद में पहचानने की कोशिश करते हुए कहता चलो तुम्हारे घर तुम्हारी भी बारी आयेगी।
हर घर से मिलते खीचिये, फफलियाँ, बेसन की चक्कियाँ, धाणे (मतीरे के सेके हुए बीज), फूलियाँ(पोपकॉर्न), कोपरे और पैसे। जिस घर में बच्चे की पहली ढूंढ होती वहाँ से दुगूनी चीजें मिलती क्योंकि उस बच्चे के ननिहाल से भी ढूंढ का सामान आता।



फिर सारा सामान लेकर होलिका दहन वाली जगह ले जाते। लकड़ी के डांडिये और कोपरे होली में चुन देते। सारा गाँव होलिका दहन के वक्त वहाँ मौजूद होता। जब होली जल रही होती तब कोई लड़का उसमें से उछलकर प्रहलाद को निकाल लेता। कहते हैं कि जो प्रहलाद निकालता है अगली होली तक उसकी शादी हो जाती है। सारे लोग चार चक्कर लगाते होली जल रही होती तब उसके आस-पास।



चक्कर लगाते हुए उसमें से अधजले कोपरे निकालकर अपने पास सुरक्षित रख लेते जिन्हें हर साल वापिस डालकर नया निकाल लिया जाता है। इसे शुभ माना जाता है। चार चक्कर लगाने के बाद सब एक जगह बैठ जाते। कुछ लोग ढोल पर चींपे देने लगते। घरों में ढूंढ के दौरान मिली चीजें सबको बांटी जाती। और फिर रातभर खेली जाती कबड्डी। होली के अगले दिन को रामा शामा कहते हैं सारे लोग कोटड़ी में इकट्ठे होते। गाँव में तीन कोटड़ियाँ हैं और सब लोग एक दूसरे की कोटड़ी जाते। हर घर से कोटड़ी में पकवानों से सजी थालियाँ आती और सब वहीं पर खाना खाते। अफीम दिया जाता एक दूसरे को। सबको गुलाल लगाया जाता और सबसे ज्यादा मांगणियार को। क्यों कि सबका प्यारा होता है, बच्चों-बड़ों सबका। उसके सफेद बाल हरे-पीले-गुलाबी हो जाते।



और दोपहर बाद शुरू होती गैर। पानी-गुलाल-रंगों वाली। गाँव की औरतें एक जगह इकट्ठी होतीं सब लोग रंग और पानी डालते उनपर। वो नेंवजण लेकर पीछे भागने लगतीं। जिस तक पहुंच जाती उसकी पीठ पर लाल रंग की लकीरें उभर आतीं। और शाम होते-होते सब थककर लौटने लगते अपने-अपने घर। बड़े लोग एक जगह इकट्ठे होकर देशी दारू की बोतलें खोलते। जिनका पीने का लाइसेंस नहीं बना वो एक दूसरे के घर जाकर स्वादिष्ट पकवानों से सजी थाली के पास घेरा लगाकर बैठ जाते। और फिर शाम ढलते-ढलते खत्म हो जाता गाँव के रंगों से रंगा एक और रंगीन त्यौहार।



सैटरडे नाइट वाली प्लेलिस्ट अब भी बज रही है। होळके चल रहे हैं। ढोल बज रहा होगा। चने भी हो गए होंगे। अच्छा है, सब अच्छा है। पर बहुत दूर है। यहाँ तो बस मैं हूं और है अकड़ी हुई गर्दन जो इन दिनों सिर्फ सीधा ही देख सकती है।