Wednesday, 25 October 2017

यहां की औरतों की रात होती है, नई सुबह नहीं होती

कैसे बीतते हैं गांव में महिलाओं के दिन?

वो कहती हैं, ‘’आदमी बाहर रो काम करे म्हे घर रो. गळत की है इये में?’’


जैसलमेर में मेरे अपने गांव लौद्रवा में सुबह आंख खुलने से लेकर सोने तक महिलाएं घर के कामों में जुटी रहती हैं.



मेरे गांव की तरह आसपास के गांवों की महिलाओं का भी यही ढर्रा है. घर के काम महिलाएं करेंगी और बाहर के पुरुष.


यहां की महिलाओं से कभी इस बारे में बात करूं तो उन्हें ये भेदभाव नहीं लगता.   

वो अपने तर्क देती है और मैं अपने. अंत मैं वो कहती है कि इसे कुछ हो गया है. आखिर में मेरे हाथ बस उनकी वो तस्वीरें ही लग पाती हैं, जो मेरी आंखों देखी हैं. 


जब मेरी आंख खुलती है तीन चीजें हो रही होती है. सामने सूरज उग रहा होता है. बगल में बरगद पर चिड़ियों की चहचहाहट होती है और आंगन से आ रही होती है दही को मथने वाले बिलौने की आवाज़. 

चूल्हे का धुआं आसमान में घुलता रहता है और तवे पर पकती रहती हैं गेंहू, बाजरे की रोटियां. चूल्हे की आग की तरह यहां की महिलाओं की आंखों की रोशनी भी धीरे-धीरे बुझती जाती है.  

तड़के सोकर उठे बच्चे पढ़ने से बचने के लिए अपनी मांओं की गोद में सो जाते हैं, जो इन बच्चों से भी पहले उठकर हाथ वाली चक्की से आटा पीस रही होती हैं.


बिजली वाली चक्कियां आने के बाद हाथ वाली चक्कियों का काम कम हो गया है लेकिन महिलाओं का पीसा जाना कम नहीं हुआ है. 


दोपहर के वक्त यहां औरते इकट्ठी होकर घर के लिए कपड़े-बिस्तर वगैरह बनाने बैठ जाती हैं या फिर अनाज़ साफ करने बैठ जाती हैं, ज्यादा अनाज हो तो बाहर मैदान में जहाँ सही हवा आ रही हो वरना खिड़की में बैठकर.

अगर खेत में कुछ बोया हुआ है तो घर के काम निपटा के एक साथ ही सारी औरतें खेत को निकल जाती हैं. रंग-बिंरगे कपड़े पहने हुए हरे-भरे खेतों के बीच पतली रेतीली पगडंडी से गुजरती हुई.

वैशाख के महीने में कभी-कभी सारी महिलाएं तालाब या गांव में पशुओं के पानी पीने के लिए बनी जगह को साफ करने निकल पड़ती हैं

ढलती दोपहरों में वो गुंथवाती हैं बाल. ललाट के दोनों तरफ से सुंदर-सुंदर लटें निकलवाते हुए. मैं ढलती दोपहर में बोर होता हूं तो गाने चला के मां को बड़ी मां के बाल गूंथते देखता रहता हूं.

धूप में बच्चों को बाहर जाने से रोकती मांएं रेतीली आंधियों वाली दोपहरों में थपेड़कर, लोरी सुनाते हुए बच्चों की सुलाने की कोशिशों में लगी रहती हैं.

शाम में फिर से गायों को दूहना और चारा-पानी. फिर से खाना बनाना. और सबके सोने के बाद सो जाना. ताकि उस सुबह उठा जा सके जो उनके लिए शायद नई नहीं है. 

Sunday, 30 July 2017

मोह बांध रहा और मोहब्बत बैचेन कर रही

बस की खिड़की पर मौसम की नमी जमती जाती है। सड़क पर कितना अंधेरा है और इस अंधेरे को चीरते बस भागी जाती है मन के अंधेरे को धोते हुए। कैसे रात कटे और सुबह हो। उस शहर में सुबह जिससे मैंने जी भरकर नफरत की और उसी शहर के लिए इतना इंतज़ार। डर जाता हूं कि बारिश हो रही होगी तो? कैसे समझाऊंगा खुदको। पिछली बार कितना कोसा था बारिश को। उस दिन ज्यों-ज्यों दिन गुजर रहा था ऐसे लगता जैसे सबकुछ डूब रहा हो। दीवार में दुबके कबूतर को घंटों देखता रहा भीगते हुए। वो पंख फड़फड़ाकर उड़ता और बूँदें उसे वापिस उसी जगह बैठा देती । और मौसम साफ होने पर भी घर से निकलना ना हुआ तो? मेरी बैचेनियों को कौन हाथ थाम ले जाएगा।

कैसे चहकता सा दौड़ रहा था तीन महीनों से छूटी गलियों में दौड़ते हुए। सब चेहरों को देखने की ठाने मन इंतज़ार कर रहा था आने वाली ट्रेनों का। ट्रेनें जो घाटों और रेगिस्तान के शहरों से, रोज कोसने के बावजूद इस कभी ना छूटने वाले शहर को आती हैं। और इंतज़ार खत्म हुआ तो सुबह आई संदेश ले कोई बुरा। चुप सन्न सा मन सब कुछ समेट कर भागना चाहने लगा। क्या बोलूं। लेक्चर दे दूं? पर लेक्चर देने से नफरत है। खुद को कितना बुरा लगता है जब अपनी बात कहकर किसी के चेहरे पर चुप्पी पढ़ना चाहो और वो शब्दों की चाशनी से शरीर को ऐंठ दे। चाही गई एक चुप्पी को छोड़कर सब दे देने वालों पर कोफ़्त होती है। मैं चुप रहा। ऐसे मन के साथ कोई सुनने के लिए कुछ नहीं कहता बस सामने वाला समझ रहा है इसके लिए कहता है। मन भाग रहा पर पाँव बँधे हैं। मोह बांध रहा और मोहब्बत बैचेन कर रही। हरे रास्तों पर खुद को भिगोकर बैचेनियों को डुबो देने की हद तक भीगता रहा खुद को हँसाते हुए।





बैचेनियाँ डूबने लगी तो शरीर बीमार पड़ गया। अपने शहर से जो कशीदे समेटे थे यों ही बिखरे रह गए। कशीदे उनके लिए जिन्हें देखकर शरीर काम्पता। उनसे कितना दूर रखा खुद को। शायद खुद को किसी के लिए बचाकर रखने के मोह में पास आने की कोशिशों को रोके रखा। हाँ भी तब करता जब लगता कि अब अंधेरा सारे दरवाजे बंद कर चुका है। तब चिढ़ाने के लिए हरियल रास्तों के सपने दिखाता। तड़प को मार दिया था किसी की और अब कशीदे देकर खुद उस गिल्ट से मुक्त होने का सामान इकट्ठा करता था। कम से कम अब इतनी दूरियाँ थीं कि पास आने का कोई सीधा रास्ता बचानहीं रह गया था।
सुबह बस की खिड़की पर धुंध छंटी तो बौछारों में भीगते हुए हँस रहा था। दिन कैसे कटता। भाग गया दूर किसी दमक में। बैचेनियाँ काट लेने भर के लिए। कोई फिर पकड़ कर ले आए उन रास्तों पर जिनसे मोहब्बत हो गई। वो जगहें जैसे दरवाज़े बंद कर रही हों। और फिर शाम आती है तो लगता है जैसे खुद के होने को कहीं छोड़ दिया। सिर्फ चेहरा है और आवाज़। कोई कुछ भी नहीं। ज़ी करता है आँखें बंद करके सुनता जाऊं। परदा जो दिखा रहा है दिमाग उसके साथ-साथ दृश्यों में घुलकर कहीं और चला जाता है।



तीन बरस पहले किसी शाम सपना देखते हुए कैसे एक नाम अटक गया था। वो नाम जो जन्म देने वाली मिट्टी में घुला हुआ था। शाम भर तस्वीरें देखता रहा। नज़दीक आने के रास्तों पर चलता गया। और रास्ते छोटे होते गए। चाह की पगडंडियों पर बाधाएँ आती गईं और नजदीकियों के रास्ते पास आते गए। इतने पास आते गए कि खुद के ना होने पर भी होंठ नाम लेते रहते। इतनी नज़दीकियाँ कि जिस शहर को जी भर कोसा वो शहर प्यार हो गया। और फिर लगता कि मुझे ही कोई मुझसे छीन रहा हो। भागते पेड़ों के बीच जैसे मैं बिखरकर इधर-उधर गिर रहा होऊं। कितने नाम हैं जाने-पहचाने कि जिन के साथ दिन सुहाने और रातें रंगीन होती हैं। डर लग रहा है सबसे। जवाब देते नहीं बनता कि मैं हूं इस शहर में।

बस पड़े रहना चाहता हूं उन दो चेहरों के पास जो गोद में खेलते हुए चेहरे बने हैं। वो कुछ भी नहीं पूछते इस सवाल के अलावा कि आप भूखे तो नहीं। मैं हँस देता हूँ जवाब देते हुए, मुझे कब भूख लगती है। रात होते-होते बैचेनियाँ पाँवों में नाचने लगती है। मैं स्टेशन मास्टर के कमरे के आगे रखी कुर्सी पर बैठे सिगरेट के धूँए के पटरियों की तरफ जाते हुए देखता रहता हूं। फाटक बंद होता है तो पैदल चलने वाले थोड़ा सा झुकते हैं और निकल जाते हैं, जो सवार होते हैं इंतज़ार करते रहते हैं रास्ता खुलने का। खत्म हो चुकी सिगरेट को देखकर दूसरी सिगरेट जेब से बाहर आ जाती है। आस या पास कुछ भी नहीं जो जला दे इसे। नीचे पड़ा सिगरेट चमकता है और झुककर दूसरी सिगरेट को चूम लेता है। महीनों पहले कि वो रात जाने कहां से उतर आती है पटरियों पर झूलती हुई। पिगलती बरफ के बीच नशे में झूमते शरीर ने चिपके होठों को दूर करते हुए चाह की थी कि ये भारीपन ना होता तो गले पर प्यारा नीला रंग उभर आता। नशे में ही उसने एक नाम लिया कि ये नीलापन उस पर कितना फबेगा।

पागल हो गया था मन उस रात। दूर अँधेरे में पिघलते हुए पहाड़ को देखते हुए वो रातभर बालकनी पर सिगरेटें झाड़ता रहा। ये नाम क्यों लिया उसने, क्या माथे पर लिखा रह जाता है ज़ेहन में अटका रह गया नाम। नाम ने उतार दिया सारा नशा जो नशे को को काटने के लिए नसों में घुला था। खुद को बचाने के लिए लकीर खींच दी उस रात और भाग आया था फिर किसी के पास आने को नकारकर।

बंद दुकान की सीढ़ीयों के नीचे से सिर निकालकर कुत्ता अजीब सा लुक दे रहा है। सड़क पर ठहरे रह गए पानी में रोडलाइट ऐसे चमक रही है जैसे पूरा चाँद हो। सुनहरी रेखा तक खत्म हो चुकी सिगरेट ने होंठों को जला दिया। पानी में झांकते चाँद के छलावे पर सिगरेट फेंकी तो छप्प की आवाज के साथ चाँद गड्डमड्ड हो गया। बुझा हुआ सिगरेट का टुकड़ा पानी पर तैर रहा है। मन नहीं समझता समझाने पर भी। ऐसे कैसे लौटा जा सकता है। मैं सोचता हूं कि मेरा होना जरूरी है।

कानों में चित्रा सिंह घुलती जाती हैं बैचेनियों में तैरते हुए-

उन के खत की आरज़ू है उन के आमद का ख़याल 
किस क़दर फैला हुआ है कारोबार-ए-इंतज़ार




Saturday, 15 July 2017

समय गठरी होता ना तो बांधकर लाद देते कांधे पर

भीगने के लिए जरूरी थोड़ी होता है कि खूब बारिशें हों। हल्की-हल्की बौछारें भी तो कभी-कभी भिगो देती हैं गहराई तक। काँच के दरवाजे को किसी उम्मीद से हल्का सा धकेलते हुए अंदर पैर रखते हैं तो कमीज पर मंडी बूँदों को देखकर कोई पूछे कि तुम तो भीग गए। तो चेहरे पर मुस्कराहट तैर जाती है, हां मैं भीग गया पूरा।
बैठते हुए आँखें देखी और भीगते-भीगते डूब गया। कुर्सियों के चारों तरफ कितना कुछ मांडा हुआ था। सबमें दिख क्या रहा था वही ना जो देखना था। जो भिगा रहा था। और देखते हुए माथे पर क्या महसूस हो रहा था, बरगद पर से अटकी हुई बूंदें झरकर माथे पर गिर रही हों जैसे।

नदियाँ कितनी दूरी तय करती हैं ना। भीगने के लिए दूरियां क्यों आड़े आएंगी। नदियाँ तो बारिशें नहीं होती ना। बारिशें कभी-कभी मुँह फेर लेती हैं। लेकिन नदियाँ जब भी बहती सब कुछ भिगोते हुए चलती। सड़क के किनारे उन चार पीले पत्थरों के पीछे की जमीन जब भीगती तो कैसे सबकुछ हरा-हरा हो जाता। उन पत्थरों के पास से गुजरती हवा में कैसी नमी होती है। हवा भी नम होती है क्या दुःखांत कहानियों के लिए और वो भी सालों बाद तक। पर नमी में जाने कौनसा सुकून है जो हर वक्त भिगोता रहता है। उन कहानियों का प्रेम शायद हवा में घुला रहा गया था बरसों बाद भी।

जैसे भीगना बचा रह जाता है सालों-साल तक। उजाला खत्म होता है और अंधेरा हँसने लगता है। भीगने की महक कुरदने लगती है कुछ घंटों बाद ही। समय गठरी होता ना तो बांधकर लाद देते कांधे पर और छिड़कते रहते हर महक के साथ छींटे बालों में।

हैरानियाँ होती हैं ना यूँ भीगने पर। कि सब बुनते होंगे कहानियाँ और हँसते होंगे। पर भीगने का जो सुख होता है वो अंधा होता है अगर अंधा नहीं भी होता है तो बन जाता है। सोते-सोते करवट बदलकर बालों में हाथ फिराओ तो भीगने की महक फैल जाती है। होंठों पर हंसी तैर जाती है। और खिड़की से लगता है हवा का झोंका आया हो कोई किसी चश़्मे को छूकर। किसी ज़ादूई चश़्मे को छूकर। ज़ादूई 🌿

Friday, 19 May 2017

बुलबुल तिल ढूंढ के दो ना

बरस चले जाते थे और दिन लौट आते। दिनों के लौट आने पर दिख जाते थे वो शब्द जो बरसों के चले जाने पर रह गए थे ड्राफ्ट में। ड्राफ्ट जाने कितनी कहानियों को छुपाए रखते हैं।
किसी के ब्लॉग पर कई ड्राफ्ट पड़े थे खाली, जिनके सिर्फ टाइटल लिखे थे। और हर टाइटल के साथ लिख रखा था नाम। जैसे एक टाइटल ये था 'बुलबुल तिल ढूंढ के दो ना'।
बुलबुल क्यों तिल ढू्ढ के देगी। ये उन बरसों के दिन थे जब वो अजीब से सपने देखकर जाग जाता था। एक नाम गूंजता था सपने में, एक तिल दिखता था और बरगद पर उड़ती रहती थी बुलबुल। एक दिन उसे लगा सपना सच हो गया।
उसने लिखा "वह सोचता है कि जिस दिन रेगिस्तान से उसका प्यार गलत साबित हो जायेगा उस दिन उसकी सच्चाई के सारे माले ध्वस्त हो जायेंगे। और सब मालों के नीचे दबी कराह रही होगी उसकी आत्मा। पर वह जानता है कि किसी भी कीमत पर उसकी आत्मा एवं रेगिस्तान के प्रति प्रेम झूठे नहीं हो सकते।"
वही नाम उसके मन में गूंजा और किसी के दिखने से पहले दिखा तिल चमकता हुआ। प्यारे से होठों और नाक को छिपाता हुआ तिल। वह देखता रहा घंटों तक तिल को। जैसे नशे में था। उसे लगा कि माल फूंक लिया और धीरे-धीरे खुदपर से काबू खोता जा रहा है वो।
उस बरस खूब बारिश हुई रेगिस्तान में। रेत के बीचोबीच पानी उछलता रहता। पंछी आते और गर्दन पानी में डुबाकर पानी उछालते। उसने पंछियों के साथ कूदते हुए पाँव डुबा लिए पानी में और खेजड़ी पर फाख़्ता के जोड़े के पास लहराते सांगरियों के गुच्छे को देखता रहा।
उस बरस हर मौसम वो खुश रहा। हर मौसम कुछ न कुछ सीखता रहा। एक रात तो उसने सोचा कि वो सीख लेगा अंग्रेजी। और कोशिश भी की।
उन सर्दियों वो दही में चूरी बाजरे की रोटी खाते हुए छाजड़े से साफ होते मूंगों को देखता रहता दोपहरों में। वह किताबों के बीच से मुस्कराते हुए झांकता रहता। बारिश के दिनों में उसने ये सारे सपने देखे थे। सर्दियों और गर्मियों में जीता रहा इन सपनों को।
वो शहर में होता तो रेत होता और रेगिस्तान में होता तो भी रेत ही होता। शहर में होकर रेत होना गर्मियों में पत्थर के मकानों के ठंडे होने जितना ही मुश्किल है।
वो दोपहरों में बरगद और बुलबुल से बातें करता रहता। किताबें जो सवाल छोड़तीं उनके जवाब बरगद से मांगता और सवाल सुनकर हंसती रहती बुलबुल।  वो चिढ जाता तो तेज आवाज़ में गाने लगता गीत बेसूरे और गीत सुनकर बरगद बंद कर देता झूमना, बुलबुल भाग जाती कानों पर रखके हाथ। वो हंसने लगता तो बदल जाता मौसम और होने लगती बारिश। बरगद पत्तों पर ठहर गई पानी की बुंदों की ठंड से सिहरने लगता बुलबुल चोंच से पत्तों को झुमाने लगती। वो बरगद के टहनियों पर फेरने लगता हाथ। बुलबुल उसकी अंगुलियों पर चोंच मारकर अठखेलियां करते हुए चूमने लगती। वो हंसते हुए बरगद और बुलबुल से विदा लेता तो दोनों खूब सारी दिखावटी बददुआएं देते।
फिर बदल जाते मौसम। मेट्रो स्टेशन पर छूट रहे होते हाथ। शहर का हर चेहरा जेसे खींच रहा उसके अंदर से सांस। वो तड़पने लगता। वो सवाल पूछने लगता कि रेगिस्तान शहर में आकर रेत छोड़ देता है क्या? रेत के रहते रेगिस्तान झूठा नहीं हो सकता।
वो भाग आता फिर उस जगह जहाँ पाँव डुबोये थे। पसीने से तरबतर। खेजड़ी की सूखी झूलती टहनियों के आगे मैदान में पानी देखकर वो आंखें बंद करके भागने लगता और छलांग लगा देता पाँव डुबाने के लिए। घुटने छिल जाते सूखी मिट्टी में घिसकर। पतली धारों में घुटनों पर से खून निकलने लगता। दूर-दूर तक कोई पंछी नहीं। पानी नहीं मृगमरीचिका थी वो। वो घुटनों के दर्द को दबाते हुए भागकर बरगद और बुलबुल से सवाल करने पहुंच जाता। सूखकर सफेद हो चुका बरगद और चुप्पी ओढे बैठी रोज गाने वाली बुलबुल से वो बेहोश सा पूछता कि प्रेम मृगमरीचिका है क्या? जवाब कुछ नहीं होता दोनों कब के बेहोश हो चुके थे।
टूटते तारों को देखकर वो पागल होने लगता और उस तारे की तरह सब तारों से दूर होने लगता। अपनी दुनिया में। दो मौसमों के लिए उसने खुद के लिए एक अलग दुनिया बना ली। कई मौसमों बाद जब बारिश हुई तो बरगद हरा हो गया और गाने लगी बुलबुल। उसने चुपके से कहा बुलबुल तिल ढूंढ दो ना।
और बुलबुल उसे सपनों में फिर से तिल दिखाती। कभी गले को ढकता तिल तो कभी गालों को ढकता तिल। हर बार तिल देखने के बाद वो घुटनों पर हाथ फेरता जैसे कि खून रिस रहा हो। और वो बेतहाशा चूमने लगता फाख्ता को भूलने के लिए घूटनों को।

•छूटी हुई कहानियां कभी ढंग से पूरी नहीं होती।

आह को चाहिए इक उम्र...


यार ये मई का महिना है

यार ये मई का महिना है
दिन तपते हैं ठरती हैं रातें
 सुबह छत पर मोर नाचते हैं
 दोपहर जाळों के नीचे होती हैं गायें
 शाम को उत्तर से उठता है बवंडर।
 यार ये मई का महिना है
 क्यों कहते निर्मम महिना है
 लू और तपत से जलाने वाला
 पसीने से तरबतर कर देने वाला
 उमस और आंधियों का महिना।
 यार ये मई का महिना है 
 मैंने खिड़की में पाँव रखे थे
 बरगद को छूकर आती हवा
जाळों पर उगे लाल-पीले पीलू
 खेजड़ियों से झड़ते खोखे
 टूळों पर लटकते पाके।
 यार ये मई का महिना है
 ये मेरा महिना है
 मैंने खुद को जलाने की चीजें चुनी नहीं
 ना ही पत्थर चुने और ना ही वायरों का हवा-पानी।
 यार ये मई का महिना है
 कपड़े सिली बोतल का पानी पीना है
 डाखणी खिड़की की हवा में सोना है
 शाम को ठाढकी रेत में फिरना है
 ढळती रात में कांगसिया बजाना है।
 यार ये मई का महिना है
 बोला ना मेरा महिना है...

Tuesday, 16 May 2017

हवा के गीतों पर झूमती गेहूँ की बालियाँ

मुझे कविताएं बहुत पसंद है। और उससे भी ज्यादा पसंद है कविताओं को नए तरीके से पढ़ना। छपी हुई कविताओं को पढ़ने से घटती हुई कविताएं महसूस करना ज्यादा सुखदायी होता है। या फिर पढ़ी जा चुकी कविताओं को ही घटते हुए महसूस करना। जैसे मैं किसी निर्माणाधीन इमारत के पास चला जाता हूं और महसूस करता हूं नरेश अग्रवाल की ये कविता-
"तुम हँसते हुए  
काम पर बढ़ोगे
और देखते ही देखते 
यह हँसी फैल जायेगी 
ईंट-रेत और सीमेंट की बोरियों पर 
जिस पर बैठकर 
हंस रहा होगा तुम्हारा मालिक।"





मैं बैठ जाता हूं किसी छोटी सी रेगिस्तानी पहाड़ी पर जाकर केदारनाथ अग्रवाल की इस कविता को समझने और महसूस करने के लिए-

"जहाँ से चली मैं 
जहाँ को गई मैं- 
शहर, गाँव, बस्ती, 
नदी, रेत, निर्जन, 
हरे खेत, पोखर, 
झुलाती चली मैं। 
झुमाती चली मैं! 
हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूं"।


मैं ऐसे ही सुकून भरी कविताओं को महसूस करने के लिए यात्राएं करने के सपने देखता हूं। कोई चुप्प सी यात्रा। बिना कुछ जाने बिना कुछ किसी से पूछे। ऐसी यात्रा जो सिर्फ मेरी यात्रा हो। मेरे महसूस करने को कोई महसूस न कर पाए ऐसी यात्रा।
पिछले दिनों में हिमाचल में था। मई-जून के महिने में हिमाचल जाने का पहला कारण हर किसी का यही होता है वहाँ ठंडक होती है। मैं समूद्र तल से 230 मीटर ऊंची तपती दोपहरों वाली जगह से ठंडी 2100 मीटर ऊंचाई वाली जगह था। जैसलमेर से धर्मकोट तक कि यात्रा में पठानकोट तक 24 घंटे की यात्रा उंघते हुए बीती। और फिर पठानकोट से निकलते-निकलते आँखें खुलनी शुरू हुई जो खोती गई सुंदर कविताओं में। पतली-पतली सड़कें, दोनों तरफ छोटे-छोटे गेंहूं के खेत, ऊंचे पहाड़। मैंने बहुत सारी कविताओं को महसूस किया इस यात्रा में।




इस यात्रा में जो चीज सबसे अच्छी लगी वो थे गेहूँ के खेत। छोटे-छोटे खेतों में लहराती गेहूं की बालियाँ ऐसे लग रही थीं जैसे हवा के गीतों के साथ नाच रही हों। मैं धरमकोट में जिस कमरे में रुका हुआ था उसके ठीक नीचे एक छोटा सा खेत था जिसकी बालियाँ हवा में लहराती रहती थी। मैं सिगरेट पीने बाहर निकलता तो लम्बी देर तक लोहे की जाली पर हाथ टिकाए सुनहरी बालियों को देखता रहता। सीढ़ीदार खेत बहुत छोटे-छोटे होते हैं। मैं रास्ते भर सोचता रहा कि कितने प्यारे हैं ये खेत, मैं भी घर के पास एक ऐसा छोटा सा खेत बना दूंगा जिसमें हमेशा कुछ उगता रहे।








मक्लिओडगंज के पास एक छोटी सी झील है, डल झील। धर्मकोट से इस झील तक पैदल रास्ता बहुत सुंदर है। घने पेड़ों के बीच से गुजरते हुए महसूस होता है जैसे आँखें बंद किए चल रहे हों। चारों तरफ शांति और पेड़ों के बीच से आती झींगूरों की आवाजें। इस रास्ते के बीच में बताया गया कि बीच में एक जगह पहाड़ी कुत्ते हैं ध्यान रखना। इन पेड़ों के बीच से गुजरते हुए जो महसूस हुआ वह मंगलेश डबराल की इस कविता से समझा जा सकता है-
कुछ देर बाद
शुरू होगी आवाज़ें
पहले एक कुत्ता भूँकेगा पास से
कुछ दूर हिनहिनाएगा घोड़ा
बस्ती के पार सियार बोलेंगे
बीच में कहीं होगा झींगुर का बोलना
पत्तों का हिलना
बीच में कहीं होगा
रास्ते पर किसी का अकेले चलना
इन सबसे बाहर
एक बाघ के डुकरने की आवाज़
होगी मेरे गाँव में।






मैंने सुना था हिमाचल के रास्ते डरावने हैं। मुझे इन रास्तों से गुजरते हुए एक बार भी डर नहीं लगा। छोटे-छोटे रास्ते। उन रास्तों पर से चढ़ती-उतरती गाड़ियाँ, ढलानों पर पशुओं को हांकती लड़कियां, रास्तों से बहुत नीचे बसे गाँव। पहाड़ों पर चढ़ते-उतरते हुए हर बार मुझे आँखों देखी फिल्म याद आती रही। मेरा सत्य वही होगा जिसे मैं महसूस करूंगा, कुछ अनुभव अभी भी बाकि हैं जो कि सिर्फ सपनों में भोगे थे। जैसे कि ये सपना मुझे बार-बार आता था कि मैं हवा में तैर रहा हूं पक्षी के जैसे।






यहाँ के लोग भी मुझे किसी कविता से लगे। चुपचाप पना काम करते हुए। आते-जाते हुए। शायद नई जगह के लोग होने के कारण मुझे ऐसा लग रहा है। सड़क पर गुजरते इस बुजूर्ग की तस्वीर देखिए या खच्चर ले जाते इस आदमी को या फिर इस राहगीर को। मुझे लगा कि से पूछूं कौनसे देश से हो पर फिर मन ने कहा कि तुम बिना सवाल-जवाब कि यात्रा के हो तो पूछा नहीं।












दूर तक ऊंचे-ऊंचे हरे और सफेद पहाड़। ऊपर की चोटियों पर गर्मियों में भी बर्फ दिख रही है। पेड़ों की लम्बी कतारों पर सुबह-शाम सूरज डूबने और उगने के रंग उतरते हैं। किसी कोने में कोई अकेला खड़ा पेड़। शाम को छोटी-छोटी चीजें जब सूरज पीछे चला जाता है तो निखरने लगती हैं।









पराशर झील धर्मशाला से छह घंटे की दूरी पर है मंडी के पास। मुझे इस यात्रा में गेहूँ के खेतों के बाद अगर कोई जगह सबसे अच्छी लगी तो वो थी इस झील के पास एक पहाड़ी। यहाँ पराशर ऋषि का मंदिर है। इस झील के अंदर एक छोटा बगीचा है जो तैरता रहता है। मंदिर में स्थानीय लोगों की भीड़ थी शायद यहाँ पर्यटक बहुत कम ही आते होंगे। मंदिर के आस पास लकड़ी से बहुत ही सुंदर कमरे बने हुए हैं। झील देखने के बाद पास की एक पहाड़ी पर चढ़े।वहां एक तार थी जिसके दूसरी तरफ छोटा सा कमरा दिख रहा था। वहाँ की हवा ऐसी थी कि बैठे रहें बस हिलें ही नहीं। दो पहाड़ियों बीच से आती ठंडी हवा और आसपास दिखते सफेद बर्फ से ढके पहाड़। भेड़ों का हांकता चरवाहा, पहाड़ों के बीच गोते खाते पंछी। मेरे लिए ये जगह बिल्कूल वैसी ही थी कि कुछ अनुभव अभी भी बाकि हैं जो कि सिर्फ सपनों में भोगे थे।

















मैं धरमकोट में रुका था। इसे छोटा इजरायल भी कहते हैं। मकलिओडगंज से थोड़ा सा आगे शांत और छोटा सा गांव है। यहाँ से कांगड़ा वैली और धौलाधर रेंज दिखते हैं। भीड़भाड़ से दूर शांति से रहने के लिए धरमकोट बहुत ही प्यारी जगह है। मैं मिस्टिक लोटस होटल में ठहरा था और इस होटल में ज्यादातर ऐसे लोग थे जो तीन-चार महिनों के लिए यहाँ रुकने आए थे। यहाँ रास्तों में अकेले फिरते हुए ऐसे लगता है जैसे हर चीज कविता कह रही हों। पेड़ों के बीच से रोशनी बिखेरता सूरज, पत्थर पर खिलता अकेला फूल, पास में बैठा उबासी लेता कुत्ता, स्कूल में खेलते हुए थककर सीढ़ियों पर बैठे बच्चे।


















मैं फिर से इन तस्वीरों को देखता हूं तो ऐसे लगता है जैसे मेरे किसी प्रिय कवि की कविताएँ हैं जिन्हें मैं बार-बार पढ़ता हूं। इन सामने घटती कविताओं में सुख है महसूस करने का पास बैठकर।

Saturday, 13 May 2017

बंजारे जी उठे सुनकर कहानियाँ

बंजारे जी जाते थे तपते जेठ के दिनों में जब जाळों पर छाए होते पीलू और खेजड़ियों पर खोखे। पंछी गाते और जिनावर सोते थे। दिनों में जब पेड़ों के नीचे धूप काढ रही होती कशीदे तब पेड़ों की छाँव में कहानियाँ बन जाती थीं औषधियाँ।

तेज धूप जब ढक जाती थी बादलों की छांव में। जब बोलने लगते मोर टहनियों से निकालते हुए कलंगी वाली गर्दनें। जब पेड़ों पर लटक रहे होते पीलू खाते बच्चे। अधेड़ कूट रहे होते पते कोटड़ी में। बकरियां खा रही होती खेजड़ियों के नीचे खोखे। बच्चे ऊंघ रहे होते डाखणी हवा वाली खिड़कियों के नीचे। औरतें बुन रही होती रालियाँ। तब बंजारे पी रहे होते कहानियों की कच्ची शराब।

 जैसे अाज की कहानी, किसी पुजारी के वादे की। कहानी बरसात के मौसम की। कहानी काळ के डर की। जमाने का तीसरा महिना यानि की अगस्त। रूई के फाहों से बादल उपड़ आते दोपहरों में और शाम तक लौट जाते बिन बरसे। आस खो चुके किसान और ग्वाळ कातर नज़रों से हर शाम तकते आसमाँ। रेगिस्तान के अंतिम छोर का कोई गाँव। बरस उन्नीस सौ तिहत्तर, या बंजारों की कहानियों की बोली में कहें तो तीसा यानि विक्रम संवत 2030 के दिन। आईनाथ जी के मंदिर में धूंप जल रहा है, पुजारी जी मंदिर से निकलकर अपने घर जा रहे हैं। पुजारी जी जो गाँव के स्कूल में पढ़ाते भी हैं। गांव के लोग खूब मानते माड़साब्ब को। सुबहों को छाछ दोपहरों को केर-सांगरियाँ और रातों में ठंडे पानी के मटके भरकर गाँव के लोग पैरों पर खड़े रहते हर वक्त माड़साब्ब के लिए।

 एक दिन माड़साब्ब मंदिर से निकले ही थे कि गाँव का एक भील काळ से डरा हुआ पुजारी जी को मिल जाता है, गिड़गिड़ाने लगता है गुस्से में। आप कैसे पुजारी हैं जो बारिश नहीं करवा सकते। बता दीजिए अब कब होगी बारिश। पुजारी जी एकदम से चुप्प। पूजा-पाठ, चौघड़िया-बिघड़िया, मुहूर्त तक तो ठीक है अब बारिश कहां से करवा दें। फिर भी बोल दिया कि कुछ दिन बाद होगी बारिश खूब। तब तक में उपवास रखता हूं। अब माड़साब्ब ने बोल तो दिया पर बारिश कहां से करवाएंगे। आईनाथ जी का भोपा माड़साब्ब के एकदम खास आदमी। माड़साब्ब आप भोपे रा खेळा। आते ही पूछा कि मैंने तो ऐसे बोल दिया बारिश का और रख दिया उपवास अब क्या करें। भोपे ने अगरबत्ती जलाकर आखे लिए और हंसते हुए बोला आज से बारिश होने तक मेरा भी उपवास। और ग्यारहवें दिन बारिश होगी।

 दूसरे दिन तेज धूलभरी आंधी शुरू हो गई। स्कूलों की छुट्टियों के दिन। भोपा और माड़साब्ब दोनों सुबह छाछ पीकर पूरा दिन निकाल देते। आठवां दिन चढते-चढते माड़साब्ब के बीछणी होने लगी बादलों का तो कोई नामोनिशान ही नहीं बारिश कैसे होगी। उतरे चेहरे से भोपे को देखा भोपे ने कहा बारिश होगी चिंता मत करो। ग्यारहवें दिन की दोपहर बीतते-बीतते आंधी रुक गई और उमस होने लगी। ओतरे कूंट में काळ्याण उपड़ने लगी और आंधी के साथ तेज बारिश। तीन घंटे बाद बारिश ज्यों ही रुकी सामने की मकान से दादी हाथ में थाली और छाछ का जग भरे निकली। थाली में केर-सांगरी, फुलके और कोळियो। माड़साब्ब ने हंसते हुए आईनाथ जी को धोक दी और बात रखने के लिए धन्यवाद दिया। भोपा आंखें बंद किए बैठा था। पच्चीसे के काळ से डरे किसान और चरवाहे खुश हो गए थे तीन महिनों बाद।

 कहानी खत्म होते-होते दोपहर खत्म होने को थी। चांरे की खिड़की से आती हवा बंजारे को छूती और बंजारा उंघने लगता। आज कहानी सुनने के लिए बंजारा जाने कितने दिनों बाद जागा था दोपहर में।


Saturday, 29 April 2017

घंटियाँ सिसकती हैं हलों को याद करके

वैशाख महिने के दिन। सुबह के दस बज रहे हैं पर इस वक्त भी धूप तपकर झुलसाने लगी है। एक बड़ा सा हॉल जिसे कोटड़ी कहा जाता है उसमें गाँव के सारे लोग इकट्ठा हैं, एक कोने में चद्दर पर पानी के लोटे के चारों ओर अनाज के छोटे-छोटे ढेर किए हुए हैं। उनके ऊपर प्याज रखे हैं और बीच में पानी का लोटा भरकर रखा हुआ है जिससे टिकाकर रखा है एक आईना। लोगों के चारों तरफ थालियाँ सजी हुई है, जिनमें घी चमक रहा है। पतली-पतली रोटियाँ रखी है जिन्हें यहाँ की स्थानीय बोली में फाफरिया कहा जाता है। रोटियों के ऊपर खूब शक्कर डाली गई है। बड़े बर्तन रखे हैं गुळराब से भरे हुए। रंगीन पगड़ियाँ पहने लोग एक दूसरे को मनुहार कर रहे हैं।



बात हो रही है आखातीज के त्यौहार की, जिसको अक्षय तृतीया भी कहा जाता है। राजस्थान को खूब सारे तीज-त्यौहारों के लिए जाना जाता है। आखातीज पश्चिमी राजस्थान का सबसे बड़ा त्यौहार है। यह त्यौहार किसानों और फसलों से जुड़ा माना जाता है। इन दिनों फसलों की कटाई हो चुकी होती है। ऐसे कहें कि खेत सुनहरे हो चुके होते हैं और किसान गुलाबी। खेत सुनहरे इसलिए की फसल कटाई के बाद खेत तेज धूप में झुलसकर सुनहरे नज़र आते हैं और किसान गुलाबी इसलिए कि फसल बिकने के बाद किसानों के खूंजों में चमक रहे हैं दो हजार के गुलाबी नोट। हालांकि इस बार सूखे के हालात होने के कारण किसान गुलाबी के बजाय डर से पीले हो रखे हैं।



आखातीज का त्यौहार वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। इस दिन को शुभ माना जाता है। यह दिन अबूझ सावे के रूप में भी जाना जाता है। अबूझ सावा यानी बिना पंडित को पूछे भी शुभ कार्य किए जा सकते हैं। इस दिन राजस्थान में सब से ज्यादा शादियाँ होती हैं। इन शादियों में ज्यादातर बालविवाह होते हैं। आखातीज के दिन प्रशासन को बालविवाह रोकने के लिए विशेष तैयारी करनी पड़ती है। प्रदेश की मुख्यमंत्री भी इस त्यौहार की शुभकामनाएँ देने के लिए ट्वीट करती हैं तो वो होता है "आईये, सब मिलकर बाल विवाह की कुरीति को जड़ से मिटायें और हमारी बेटियों के भविष्य को सुरक्षित करें।"
लेकिन सब व्यवस्थाओं के बाद भी सैकड़ों नन्हे-मुन्ने गुड्डे-गुडियों के खेल की तरह शादी के बंधन में बांध दिए जाते हैं।


 आखातीज के त्यौहार की शुरूआत वैशाख शुक्ल तृतीया के कुछ दिन पहले से ही हो जाती है। गाँव के सारे बच्चे एक जगह इकट्ठे होते हैं और रात भर हल जोतते हैं। ये एक खेल की तरह होता है। बड़े हल के जैसे ही लकड़ी के छोटे-छोटे हल होते हैं। बच्चों के हाथों में बैलों के गले में बंधने वाली घंटियाँ होती हैं। एक लड़का हल खींचता है दूसरा लड़का हल को पीछे से चलाते हुए बाजरा या गेंहूं बोता है और तीसरा साथ में घंटी बजाते हुए चलता रहता है। गाँव के रेतीले धोर पर बजती घंटियों की आवाज़ और बच्चों का खिलखिलाहट रातभर पूरे गाँव में घुलते रहते। हल जोतने के बाद वो रातभर खेलते और बातें करते रहते। ऐसा आखातीज वाले दिन तक चलता है।  अमावस्या और दूज के दिन खीच बनाया जाता है। खीच बाजरे से बनाते हैं जिसे घी या कढ़ी के साथ खाया जाता है। बनाने से एक दिन पहले भीगे हुए बाजरे को घर के आंगन में गड़ी हुई पत्थर की ओखली में लकड़ी के मूसल से कूटा जाता है और दूसरे दिन उसे पकाया जाता है।




अमावस्या, दूज और तीज के दिन गाँव के सारे लोग कोटड़ी में इकट्ठे होते हैं और रेवण की जाती है। जब यहाँ पर अफीम का चलन ज्यादा हुआ करता था तब यहाँ पर रेवण में अफीम गलाकर सबको मुट्ठी से पिलाया जाता था और सारे गिले-शिकवे, बैर भाव भुलाए जाते थे। सभी लोग वहीं पर खाना खाते हैं। गाँव के सारे घरों से थालियाँ आती हैं जिसे यहाँ की बोली में तासळा कहा जाता है। अमावस्या और दूज को तासळे में खीच और घी के साथ कढ़ी होती है और तीज के दिन गुळराब, घी, फाफरिये, केर-सांगरी और कई दूसरी सब्जियों के साथ तली हुई ग्वारफलियाँ और अंकुरित बाजरा और मूंग ले आते हैं। हर घर के आंगन में अनाज रखा जाता है। जिसमें बाजरा, मूंग, गेंहू और चने होते हैं।


 इस दिन मौसम का भी पुर्वानुमान लगाया जाता है। शगुन देखे जाते हैं कि आने वाले मौसम में सुकाल रहेगा या अकाल। इसके लिए हर जगह अलग-अलग तरीका अपनाया जाता है। एक तरीका ये है मिट्टी के प्याले बनाए जाते है जिनमें पानी भरा जाता है और उन प्यालों के नाम महिनों के नाम पर रखे जाते हैं और फिर उनके फूटने का इंतजार किया जाता है। जो प्याला पहले टूट जाता है उस महिने माना जाता है कि अच्छी बारिश होगी। माने की खेत भर जाएंगे बारिश के पानी से। अकाल सुकाल का पता लगाने के लिए काले और सफेद रंग के दो रुई के फाहे लेकर पानी पर रखते हैं अगर काला रूई का फाहा पहले डूब जाता है तो माना जाता है कि इस बरस सुकाल रहेगा क्यों कि अकाल डूब गया है। अब चीजें बदलने लगी हैं। त्यौहार बस नाम भर के रह गए हैं। आज ही रेवण में किसी बुजूर्ग ने कहा "पहले थालियाँ बड़ी होती थी और वो किनारों तक खीच और घी से भरी रहती थी अब थालियाँ भी छोटी हो गई और उनमें खीच भी कम। रात भर हम हल जोतते थे, खेलते थे। अब तो बस बच्चे बस तृतीया के दिन देखने को मिलते हैं। हल और घंटियों को तो भूल ही गए हैं।"  पुराने दिनों का भी कैसा नॉस्टेल्जिया है। खत्म हो रही चीजें अजीब तरीके से लुभाती हैं। लगता है कि कितने बेहतरीन हुआ करते थे वो दिन।

Wednesday, 26 April 2017

था जो खो गया, तेरी अँखियों का अनुरागी

सामने एक लड़का बैठा है जमीन पर, शायद बस के चलने का इंतज़ार कर रहा है। कितना खुश है सामने बैठे दोस्तों से बातें कर रहा है, तैयारी कर रहा होगा कुछ बनने के लिए और घर लौट रहा है।
मन है ना कितना अजीब है। बहुत सपने देखता है। चीज़ों को अपने हिसाब से डिसाइड करता है। ऐसे होगा वैसे होगा और जो हो रहा होता है वो मन का नहीं होता तो भागता है। जैसे बादलों को देखकर मैं पागल हो जाता हूं। आज कितने बादल हैं ना ऊपर। ऐसे लग रहा जैसे मुझे कोई बांध रहा है और मैं भाग रहा हूं रस्सी तोड़कर।
जगहें अपने आप में सुंदर होती हैं क्या या किसी के साथ होने से वो सुंदर हो जाती हैं? मुझे तीन साल तक जयपुर नरक लगता रहा और पिछले एक साल से मैं जयपुर के प्यार में हूं। मैं किसी के साथ उन जगहों पर गया जहाँ उन तीन सालों में नहीं गया था। मुझे लगा इन जगहों को नहीं देखा इसलिए जयपुर नरक लगता रहा। आज मैं अकेले उन सारी जगहों पर गया। लेकिन मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा। जैसा किसी के साथ उन जगहों पर होने पर लगा था।
दोस्त कहते हैं कि खुद से प्यार करो। खुद की खुशियाँ खुद में ही हैं फिर मुझे खुद से, अकेले जाने पर ये जगहें क्यों अच्छी नहीं लगी? मैं तो खुद से प्यार भी करने लगा हूं अब।
क्या हर कोई खुद में खोकर खुश रह सकता है? कभी जब सबकुछ खाली-खाली सा लग रहा हो। मन डूब रहा हो तब सबसे बात करने पर भी वैसे ही लगता रहता है। लेकिन कुछ लोग होते हैं गिने-चुने, ज़िंदगी में। उनसे बात करके ऐसे क्यों लगता है कि सबकुछ सही हो गया है। नहीं पता कि मन ऐसी धारणा बना लेता है या सच में वो लोग ही सुकून होते हैं। पर उनसे बात करते हुए ऐसे लगता है जैसे खुद से प्यार हो रहा है। अपनी हर चीज़ सुंदर लगने लगती है, अपनी लम्बी सी नाक, छोटे-छोटे दु:ख सब कुछ।
यही है बस इसी से भागता हूं, इसी से रुकता हूं और इसी में जीना चाहता हूं। और कुछ भी चाहना नहीं।
मैं तो हूं हमेशा, अभी के लिए था जो खो गया, तेरी अँखियों का अनुरागी।