Wednesday, 21 February 2018

दीवारों में उगते होंगे जरबेरा के फूल!

वह दीवारों को खुरचता और उनमें जरबेरा के फूलों के बीज चिपका देता। उसे लगता है दीवारों में भी उग आते होंगे फूल। उसे ये भी लगता कि शहर में लोगों से ज्यादा जान पथरों और दीवारों में होती है। किसी भी जगह पर उसने सबसे ज्यादा प्रेम रास्तों से किया। उन रास्तों से जिनपर चलते हुए उसे खुद के होने का एहसास हुआ।
वो गर्मियों के जाने के दिन होते थे। गाँव हरे हो जाते और निगाहें आसमान में उग आती। उन दिनों एकाध हल्की बारिशें हो चुकी होतीं। खंडहरों की कंकरीली छतें हरी हो जाती। मोगरे की हरी पत्तियों पर तिर आती थीं बून्दें।
ये वही दिन थे जब वो सामाजिक की किताब में सरस सलिल छिपाकर पढ़ने लगा था। और उसमें पढ़ी रंगीन कहानियों के हिस्से वह उस दो चोटियों वाली लड़की को खंडहरों में सुनाया करता। उसको कहानियां सुनना बहुत पसंद था। सुनते हुए वह खिलखिलाकर हंसने लगती थी। वह उन खिलाखिलाते होंठो को देखने लगता और चुप हो जाता।
उसने कहा ‘कल मैं तुम्हें एक किताब लाकर दूंगा, तुम छिपकर पढ़ना उसे’। लेकिन वह किसी भी कोर्स की किताब में छिपाकर दूसरी किताब नहीं पढ़ सकती थी। लड़के पकड़े जाते थे तो चेतावनियों भरी डांट खाकर बच जाते थे लेकिन लड़कियां पिट जाती और अगले दिन से उनका स्कूल जाना भी बंद हो जाता था।
जब दोपहर को खिड़कियों से छनकर आती धूप में खिलकर उनकी गर्दनों के निशान नीले हो जाते तो दोनों छत्त पर भाग जाते और मोगरे की जड़ें खोदकर उन जड़ों में उगे गेहूं जितने छोटे-छोटे दाने खोजते।
उसे कोई पूछता है कि गांवों में मोहब्बत कैसे होती है। वह सोचने लगता मोहब्बत कैसे होती होगी? वहां आक की झाड़ियां होती हैं और सीलन से भरी खंडहरों की दीवारें।
उन दिनों उसे लगता था कि हम जब मोहब्बत में होते हैं, कहीं भी कुछ भी उगा सकते हैं। और अब वह रात को नींद में भयावह सपने देखते हुए चिल्लाता है कि ‘संघर्ष हमारा नारा है’।


Tuesday, 20 February 2018

एंटीना और नीले निशान

तब भी मार्च आता था। अखबारों पर जार्ज बुश की बड़ी-बड़ी तस्वीरों के साथ इराक का नाम छपा रहता था। बच्चे रविवार को या तो किताबों में घुसे रहते या खंडहरों में नाक पर हाथ रखे चमगादड़ों को ढूंढ़ते थे। वह चुपचाप इंतज़ार करता था बारह बज जाने का। वह टीवी को झांकता रहता था। गाँव में कुछ ही घरों में टीवी थी। पर रविवार को टीवी देखने वाला सिर्फ वो होता था।
उन दिनों वह नई-नई दुल्हन बन कर आई थी। सब औरतें दोपहरों में ऊंघ रही होती या कहीं चौकियों पर मखौल कर रही होती। वह जब भी कमरे में आती मुस्करा देती और आलों में से कुछ ढूंढ़कर चली जाती। उस दोपहर जाने कौनसी फिल्म आ रही थी। तेज हवा से एंटीना घूम गया था।
‘आप टीवी देखते रहिए मैं एंटीना ठीक करता हूं, सही से आ जाये तो खिड़की से बता देना।’
‘ठीक है। पीछे के तरफ जो पत्थर रखे हैं उन्हें एंटीना से लगा देना फिर वो हवा से हिलेगा नहीं।’
सेट करके वह वापिस से चारपाई पर आकर बैठ गया। वो कुछ सी रही थीं और वहीं बैठकर टीवी देखने लगीं। जाने क्या बातें कर रही थीं। उन दिनों पत्रिका के साथ रविवारिय अंक आता था जिसमें कहानियां होती थीं। एड आई तो वह उस पन्ने को टटोलने लगा। उन्होंने बालों में हाथ फेर कर कहा ‘तुम इतने चुप क्यों रहते हो।’ उसने देखा और हंसने लगा। ‘मुझे पढ़ना नहीं आता, ये इसमें क्या लिखा है। वह कहानी सुनाने लगा। उन्होंने खिड़की बंद करते हुए कहा ‘कितनी धूल आती है’। 
‘देखो तो मेरी पीठ पर क्या चुभ रहा है’। 
‘कुछ भी नहीं है’
‘वहां डोरी के नीचे देखो’
उसने डोरी के नीचे उंघली फिराई। उसे स्कूल के शैतान बच्चे याद आ गए जो मई तक का महीना गिनते हुए उंगली कर देते थे। डोरी में पतली सी भुरट की सिळी लगी थी। निकालते हुए उसके मुँह से जाने क्यों जनवरी, फरवरी निकलने लगा। मई पर आते-आते उन्होंने छात्ती में भींच लिया। ढीली सी टीशर्ट खिसक कर उसकी बाहों में झूल गई। उसने दांत छाती के नीचे गड़ा दिये।
‘कितने भोले बच्चे बनकर रहते हो। क्या कर रहे हो ये।’
उसने ओढ़ण खींचकर चेहरा छुपा लिया।
हवा खिड़कियों के सुराखों से टकराकर आलों में बिछे अखबारों को बिखेर रही थी। उसने टीशर्ट ठीक किया और भाग गया। गायों की रखवाली का वक्त था ये।
बच्चों की गर्दनों पर मंड गए निशानों पर किसी की नज़र नहीं जाती थी। वह पीलू खाने ऊंची डालों पर लटकता था या चमगादड़ों को पकड़ते हुए खंडहरों में कई बार घिसट जाता था। उस नीले निशान पर किसी ने शक नहीं किया।
अब भी मार्च आने वाला है। अखबार नहीं देखा उसने जाने कितने दिनों से। उसे रोते हुए देखकर किसी ने सलाह दी। ‘तुमने कभी आँखों में आँखें डालकर कहा है’
‘नहीं, डर लगता है मुझे’
वह कोई खास दिन था। उसने सोच लिया था कि वो आज आँखों में देखेगा। वह नहीं देख पाया। नज़र फेरकर आसमान देखते हुए वह बोलता रहा और फिर रोने लगा। पता नहीं कब वह किसी के सामने ऐसे रोया था। 
‘मैंने कह दिया’
‘उसने क्या कहा’
‘वही जो हमेशा कहती है।’ रोती सी आवाज़ में उसने कहा ‘ऐसा क्यूं होता है मेरे साथ’
‘तुम रोमांटिक नहीं हो’
वह हंसने लगी। और खामोश ही गई। यह सबकुछ शांत होने का एक छोटा सा पल था।
वह चेहरा देखती रही बोली ‘केन वी किस्स’
‘नो’ उसने कहा ‘वॉव, कंसेट! शुक्रिया। और वो हंसने लगा।
‘इस मोहब्बत ने मुझे कितना ‘पवित्र’ बना दिया है।’
‘तो फिर क्यों नहीं चले जाते हो तुम टूर पर?’ उसने आँख मारते हुए कहा। दोनों हंसने लगे।
और सारी कहानियां उसकी आँखों के आगे फिरने लगी। जैसे किसी ने एंटीना घुमा दिया और साफ सिग्नल आने लगे थे। स्क्रीन पर नीले निशानों से भरी गर्दन और कंधे चमक रहे थे। बचपन में कोई ऐसा हुआ होगा क्या।
वह डरने लगा था लोगों से, रोशनी से। 
वह चिलाने लगा खाली कमरे में। ‘मैं कहां जाऊंगा अगर हार गया तो। कोई घर चला जायेगा, कोई शहर चला जायेगा। मैं भी चला जाऊंगा कहीं ना कहीं। कोई तो जगह होगी जहां मैं जा सकूंगा। खो जाऊंगा मैं एक दिन। दूर कहीं, बहुत दूर।’
वह बोलती रही। समझाती रही। उसे सिर्फ इतना सुनाई दिया ‘यह भी एक फेज होता है, उम्र का फेज। निकल जाता है तो कुछ भी याद नहीं रहता’।
वह उठकर चला आया था। यह भी एक फेज है जिसे सिर्फ खाली कमरे समझ सकते हैं।




Friday, 9 February 2018

मर जाने के ख़्वाब भी इतने खूबसूरत होते होंगे

वो अचानक सपने से जागा। पहली बार उसने इतना खूबसूरत सपना देखा था नींद में। मर जाने के ख़्वाब भी इतने खूबसूरत होते होंगे।⠀⠀
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उसने देखा किसी गर्म दोपहर वह अचानक इस खेजड़ी के पेड़ के नीचे सोते हुए दुनिया से गायब हो गया। मर जाने के बाद गांव और शहर को जोड़ती रेत से भरी किसी सड़क के किनारे उसकी एक मजार बनाई गई। मजार के पास एक बड़ी सी चौकी जिसपर हमेशा बिखरे रहते हैं रेगिस्तान में उगने वाले फूल। गार निपी इस चौकी के किनारों पर दीयों की रोशनी में हर दूज को चमकने लगते हैं मिट्टी पर उभरे हाथों के निशान और पीले पोतिये। हर चांदनी दूज की रात में दिनभर की थकी-हारी हवा में घुल जाती है तंदूरे और कांगसियों की आवाज़। चौकी के एक किनारे घोल घेरे में कंधे पर तिरछे ओढ़ने डाले औरतें उगेर रही हैं मीरा के भजन।⠀⠀
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उसने देखा की मज़ार के किनारे एक बहुत बड़ी झोंपड़ी बनी है। जिसकी दीवारें किताबों से भरी हैं। दूर तक घुलती जाती है पुराने पन्नों की महक। आने वाले सब लोग झोलों से किताबें निकालकर बांटते हैं प्रसाद में। मज़ार पर आने वाले मन्नत मांगने के लिए चढ़ा जाते हैं किताबें। मजार के पास बरगद और खेजड़ी के पेड़ों के झुरमुट पर फुदकती सफेद गालों वाली बुलबुलें और फाख़्ताएँ गाती रहती हैं उन किताबों में छपने से बचे रह गए गीत। पेड़ों के नीचे निक्कर पहने बच्चे बनाते रहते हैं छोटे-छोटे पत्थर चुनकर घरोन्दे और जब थक जाते हैं खेलते-खेलते तो बनाने लगते किताबों में देखकर दीवारों पर आड़ी-तिरछी रेखाएं।⠀

दूर रेत के टीलों के बीच सांझ को पतले चाँद का परदा ओढ़े बच्चों को कहानी सुना रहे हैं दो लोग। बच्चे बकरियों के गले में बाँहें डाले कहानियां सुनते हुए बीच-बीच में हंसते तो बकरियों के गले की घंटियां खिलखिलाने लगतीं। उसने कहानी सुनाने वालों के चेहरे पहचानने की कोशिश की। उसने देखा एक वो खुद ही था। वो कहानी सुना रही लड़की के चेहरे को निहार रहा था और लड़की कहानी सुनाते रुककर उसकी आंखों पर हथेलियां रखकर कह रही इधर मत देखो मेरी तरफ, ऊपर देखो ना आसमान में। ओह वो ज़िंदा था! फिर ये मज़ार किसकी थी। वो जाग गया था। उसने देखा खिड़की से तारे दिख रहे थे रोशनी से डूबे इस शहर में भी।


Friday, 8 December 2017

उस फकीर ने कहा था कि ‘तुम अपने औलिया खुद ही हो यहाँ कुछ मत मांगा करो।’

बंजारा डेरे से निकलकर बाहर बकरियों के बाड़े में आकर बैठ गया। आसमान की और देखकर उसने कहा ‘कितनी ठारी पड़ रही है’ और खुद को बरड़ी में लपेट लिया। बाड़ के बाहर हाथ तपने को लकड़ियाँ जला ली और चिलम में खीरे भरने लगा। बाड़ से पीठ टिकाए उसने सिर ऊपर करके किरतियों को देखा और भीतर से उठी गहरी उसांस चिलम के धूएं में मिलकर जाळों में खो गई। आगळ के पास ऊंघती बकरी के सिर पर हाथ फेरकर उसने पूछा ‘तुमने कभी किसी की जान ली है क्या?’ उसे लगा बकरी फुसफुसाकर कह रही है ‘हाँ शाम में ही तो खेत में अभी-अभी उग आए चने के पौधों की जान ली थी।’ उसे याद आया किसान का गुस्से भरा चेहरा देखकर वो हंस पड़ा था।

बरसों पहले के काळ के दिन जैसे धुएं में आकार लेकर बाड़ पर मंडने लगे थे। वो जिनावरों के साथ डेरे छोड़कर परदेश चले गए थे। कितना दुख देखा देखा था सड़कों के किनारों पर उसने। बारिश की खबर मिलते ही वो अपने मुलक भाग आए थे। कितनी रातों तक वो डरावने सपने देखता रहा जैसे उसके प्रेम से गुस्सा हुए लोग उसके पीछे कुदालियाँ लेकर भाग रहे हों।

बाड़े पर से उड़ते हुए चमगादड़ को अंधेरे में खोते हुए देखने लगा वो। वो सोचने लगा कि क्या उसने सच में प्रेम किया था कभी। वो बंजारन उसे याद आई जो छाछ लेने आया करती थी दोपहरों में। उसने डेरे के कोने पर छप गए गहरे निशान देखने की कोशिश की। अलग होते हुए उस बंजारन के कहा कि अब तुम्हारे मूच्छें उग रही हैं और दोनों हंसते रहे थे छिपकर। बंजारा अपनी मूच्छों और दाढ़ी पर हाथ फेरकर खींप की छोटी-छोटी लकड़ियों के अलाव में फेंकता रहा। लकड़ियाँ आग छूते ही खत्म हो जाती। वो बंजारन घुमक्कड़ बंजारों के डेरे से आती थी और किस्से बांचती थी गांवों के। काळ के दिनों में यहीं छोड़कर परदेश गया था और काळ बिताकर लौटने के बाद वो सालों तक बाट जोहता रहा इस जगह उसकी।

वापिस डेरे में जाकर खाट पर ऊंघने की कोशिश करते हुए वो सोचने लगा कि उसके पास सबके लिए शुभकामनाएँ क्यों हैं हजार चुप्पियों के बाद भी। कितनी बार सोचा है उसने कि वो अब बद्ददुआएं देगा लेकिन उसे धोरे के उस पार के पीर बाबा याद आ गए, उस फकीर ने कहा था कि ‘तुम अपने औलिया खुद ही हो यहाँ कुछ मत मांगा करो।’ उसे अपना वादा याद हो आया। पेड़ की टहनी पर उसने बरड़ी का लाल धागा बांधा था कि मन्नत पूरी हुई तो वो शहर जाकर कव्वाली सुनेगा और लौटकर सबको खीर खिलाएगा।

वो अब भी सोच रहा है कि उस शहर के कमरे में अकेलेपन से भागती वो आत्मा इस सर्दी में उस छोटी पहाड़ी या छत पर कैसे जाती होगी...


Wednesday, 6 December 2017

मुझे छोड़ दो मैं बस इतना बताकर लौट आऊंगा कि 'मैं दिल्ली में हूं'

शायद दो दिनों से ना सोने के कारण था या फिर बीमारी होने का असर वो बिस्तर पर बैठे-बैठे लेपटॉप घुटनों पर रखे ही सो गया। अचानक से चिल्लाकर उठा तो देखा उसके दोनों हाथ खिड़की की जाली में फंसे थे। वो सपने में चिल्ला रहा था ‘मैं दिल्ली में हूं, मैं दिल्ली में हूं।’

शायद उसे अब यह बताने की जरूरत नहीं ही होगी। उसने याद करने की कोशिश की कि सपना क्या था। वह जंगल से गुजर रहा और किसी ने उसका हाथ पकड़ रखा है, वह हाथ छुड़ाकर कह रहा है कि मैं ठीक हूं। पर उसके हाथ को कसकर पकड़ लिया गया है और कहा जा रहा है कि किसी अच्छे डॉक्टर के पास ले जाया जायेगा उसे। वह कह रहा है मुझे छोड़ दो मैं बस इतना बताकर लौट आऊंगा कि मैं दिल्ली में हूं।

वह सोच रहा है कि कल वह सामने वाली दीवार पर बोर्ड के साथ-साथ गांधीजी के तीन बंदरों वाला पोस्टर भी चिपका देगा। किये जाने वाले कामों की लिस्ट के साथ वह दिनभर उन पोस्टरों को भी देख सके। वह खिड़की में देख रहा है एक बंदर आँखों पर हाथ रखे कह रहा है कुछ मत देखो। सच मैं कितना पढ़ता या सोता होगा कोई कि कुछ देख भी ना पाए।

वह देख रहा है उस रोडलाइट और पेड़ों के पास वाली छोटी सी पहाड़ी पर बैठे बंदर को मुँह पर हाथ रखकर यह कहते हुए कि चुप हो जाओ। वह चुप हो गया है। उसके कहने से आत्माएं दुखती होंगी।
वह देख रहा है बंदर को मुस्कराते हुए कानों पर हाथ रखकर। कुछ भी नहीं सुनाई देता होगा उसे। वो उसका एकमात्र सच भी जो बेहोशी में कहा गया था उसने और शायद फोन का वाइब्रेशन भी महसूस नहीं होता होगा। वह अब चुप हो जायेगा।

उसे लगा कि इन दो दिनों में वह कितने लोगों को खुश कर सकता था। एक दोस्त का मैसेज देखकर वो रोने लगा। मैसेज था
“अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं
योद्धाओं की लंका है,
‘मानस’ तुम्हारा ‘चरित’ नहीं
चुनाव का डंका है”

पर अब वो बहुत देर कर चुका था।

वह सुबह डाउनलोड की गई अम्बेडकर की तस्वीर देखकर फिर से रोने लगा। वह अब ‘समझ’ गया था कि किसी को कोई नहीं समझ सकता। जबकि वह कहता फिरता था समझना सबसे आसान और सुकून वाला काम है।


Thursday, 23 November 2017

बुलबुलों की चोंच में कठपुतलियों के डोरे

आज नीली शाम आई है दिनों बाद। पूरे दिन के अंधेरे के बाद छत से लिपटती छायाओं के साथ हर ओर नीलापन उतर रहा है। बरगद के पत्तों में दिन की ही तरह कोई हरकत नहीं है। धूप लौटते कौओं के साथ जाने कहां उड़े जा रही है। ऐसे लगता है जैसे सबकुछ रुक गया हो। सूखे पत्ते चुपचाप देख रहे हैं सबकुछ होना।
यूँ भी कहीं कोई ठहर जाता होगा क्या? अपने दुखों की लकीरें खुद की खींची होती हैं और दोष जाने किसी कूची पर जाकर ठहर जाता है। सबके अपने-अपने सवाल हैं निस्तेज होती आँखों से, क्या इन दुखों का कारण कोई धुआँ है या फिर किसी ने छीन ली हैं ऊंगलियों की हरकतें। क्या बीमार हूं मैं? लगता तो नहीं। पर बीमार ही तो हूं, बहुत बीमार। मैं क्यों उड़ जाता हूं रोज उन रास्तों पर। ये जानते हुअ कि कोई भी शक्ति किसी को कुछ भी नहीं दे सकती मैं क्यों घंटों औलिया का नाम जपता रहता हूं। मुझे लगता है हम सब अपने औलिया खुद हैं और अपने सुख-दुख गले में बांधे घूमते रहते हैं। इतना आसान होता है क्या होना ना होना।
हर बार सोचता हूं ठहरी हुई चीजों में कुछ हरकत होगी पर चीजें और जड़ होती जाती हैं। आदमी भागकर कहां तक जा सकता है। क्या कोई जीते जी ओझल हो सकता है। तब जब किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता होने या ना होने से।
मुझे उस आदमी की याद आई आज दोपहर जिसने कहा था कि ''तुम उम्मीद हो अंधेरे से बाहर निकलो। तुम्हें सामाजिक होना चाहिए। जब दुखों से घिरे होते हैं तो तुम्हें पढ़कर जी जाते हैं। तुम्हारे अंदर कुछ भी करने की ताकत है। ऐसे मन की कोई नहीं कर पाता है तुम्हारी तरह। तुम्हें और लिखना चाहिए बिना डरे ताकि हम पढ़ते हुए अपने दुखों के झेल सकें।'' मैं चेहरे पर मुस्कराहट तैर गई थी। घुमा फिरा के कोई ये बात रोजाना कह जाता है। पर मैं कैसे कहूं कि मैं खत्म हो चुका हूं। हर रोज जाने कौनसी डोरी है जो मेरे गले में कसती जाती है। डोरी में ढ़ील आती है तो मैं जी उठता हूं कई दिनों के लिए लेकिन फिर किसी रोज डोरी कसती है और मैं तड़प उठता हूं।
एक दोस्त ने रहा था ''किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता, हमें आगे बढ़ जाना चाहिए। खुद को खिलौना बनाकर यूं किसी को सौंपना निरी मूर्खता है।'' काश कि आगे बढ़ जाना कहने जितना ही आसान होता। हर कोशिश के बाद खुद को वहीं फिर से वहीं खड़ा देखता हूं। जैसे सब कुछ एक ही बिंदू पर सिमटकर रह गया है।
मैं वहां से भाग आया था कि लोगों, जानवरों और मिट्टी में घुलकर सबकुछ भूल जाऊंगा। पर आँखें उन्हीं चेहरों को आगे रख देती हैं रोज सुबह। कलाइयाँ कसमसाकर टूटती सी लगती हैं। रातभर के बुरे सपने जैसे हर सुबह सच बनकर सामने आ खड़े होते हैं।
ऐसे क्यूं अचानक सारे रंग उड़ जाते हैं। सबकुछ अंधेरे में डूबता हुआ सा लगता है। क्यूं कोई जीवन में इस तरह से आता है। जो न साथ होना चाहता है ना ही जाना।


Wednesday, 25 October 2017

यहां की औरतों की रात होती है, नई सुबह नहीं होती

कैसे बीतते हैं गांव में महिलाओं के दिन?

वो कहती हैं, ‘’आदमी बाहर रो काम करे म्हे घर रो. गळत की है इये में?’’


जैसलमेर में मेरे अपने गांव लौद्रवा में सुबह आंख खुलने से लेकर सोने तक महिलाएं घर के कामों में जुटी रहती हैं.



मेरे गांव की तरह आसपास के गांवों की महिलाओं का भी यही ढर्रा है. घर के काम महिलाएं करेंगी और बाहर के पुरुष.


यहां की महिलाओं से कभी इस बारे में बात करूं तो उन्हें ये भेदभाव नहीं लगता.   

वो अपने तर्क देती है और मैं अपने. अंत मैं वो कहती है कि इसे कुछ हो गया है. आखिर में मेरे हाथ बस उनकी वो तस्वीरें ही लग पाती हैं, जो मेरी आंखों देखी हैं. 


जब मेरी आंख खुलती है तीन चीजें हो रही होती है. सामने सूरज उग रहा होता है. बगल में बरगद पर चिड़ियों की चहचहाहट होती है और आंगन से आ रही होती है दही को मथने वाले बिलौने की आवाज़. 

चूल्हे का धुआं आसमान में घुलता रहता है और तवे पर पकती रहती हैं गेंहू, बाजरे की रोटियां. चूल्हे की आग की तरह यहां की महिलाओं की आंखों की रोशनी भी धीरे-धीरे बुझती जाती है.  

तड़के सोकर उठे बच्चे पढ़ने से बचने के लिए अपनी मांओं की गोद में सो जाते हैं, जो इन बच्चों से भी पहले उठकर हाथ वाली चक्की से आटा पीस रही होती हैं.


बिजली वाली चक्कियां आने के बाद हाथ वाली चक्कियों का काम कम हो गया है लेकिन महिलाओं का पीसा जाना कम नहीं हुआ है. 


दोपहर के वक्त यहां औरते इकट्ठी होकर घर के लिए कपड़े-बिस्तर वगैरह बनाने बैठ जाती हैं या फिर अनाज़ साफ करने बैठ जाती हैं, ज्यादा अनाज हो तो बाहर मैदान में जहाँ सही हवा आ रही हो वरना खिड़की में बैठकर.

अगर खेत में कुछ बोया हुआ है तो घर के काम निपटा के एक साथ ही सारी औरतें खेत को निकल जाती हैं. रंग-बिंरगे कपड़े पहने हुए हरे-भरे खेतों के बीच पतली रेतीली पगडंडी से गुजरती हुई.

वैशाख के महीने में कभी-कभी सारी महिलाएं तालाब या गांव में पशुओं के पानी पीने के लिए बनी जगह को साफ करने निकल पड़ती हैं

ढलती दोपहरों में वो गुंथवाती हैं बाल. ललाट के दोनों तरफ से सुंदर-सुंदर लटें निकलवाते हुए. मैं ढलती दोपहर में बोर होता हूं तो गाने चला के मां को बड़ी मां के बाल गूंथते देखता रहता हूं.

धूप में बच्चों को बाहर जाने से रोकती मांएं रेतीली आंधियों वाली दोपहरों में थपेड़कर, लोरी सुनाते हुए बच्चों की सुलाने की कोशिशों में लगी रहती हैं.

शाम में फिर से गायों को दूहना और चारा-पानी. फिर से खाना बनाना. और सबके सोने के बाद सो जाना. ताकि उस सुबह उठा जा सके जो उनके लिए शायद नई नहीं है. 

Sunday, 30 July 2017

मोह बांध रहा और मोहब्बत बैचेन कर रही

बस की खिड़की पर मौसम की नमी जमती जाती है। सड़क पर कितना अंधेरा है और इस अंधेरे को चीरते बस भागी जाती है मन के अंधेरे को धोते हुए। कैसे रात कटे और सुबह हो। उस शहर में सुबह जिससे मैंने जी भरकर नफरत की और उसी शहर के लिए इतना इंतज़ार। डर जाता हूं कि बारिश हो रही होगी तो? कैसे समझाऊंगा खुदको। पिछली बार कितना कोसा था बारिश को। उस दिन ज्यों-ज्यों दिन गुजर रहा था ऐसे लगता जैसे सबकुछ डूब रहा हो। दीवार में दुबके कबूतर को घंटों देखता रहा भीगते हुए। वो पंख फड़फड़ाकर उड़ता और बूँदें उसे वापिस उसी जगह बैठा देती । और मौसम साफ होने पर भी घर से निकलना ना हुआ तो? मेरी बैचेनियों को कौन हाथ थाम ले जाएगा।

कैसे चहकता सा दौड़ रहा था तीन महीनों से छूटी गलियों में दौड़ते हुए। सब चेहरों को देखने की ठाने मन इंतज़ार कर रहा था आने वाली ट्रेनों का। ट्रेनें जो घाटों और रेगिस्तान के शहरों से, रोज कोसने के बावजूद इस कभी ना छूटने वाले शहर को आती हैं। और इंतज़ार खत्म हुआ तो सुबह आई संदेश ले कोई बुरा। चुप सन्न सा मन सब कुछ समेट कर भागना चाहने लगा। क्या बोलूं। लेक्चर दे दूं? पर लेक्चर देने से नफरत है। खुद को कितना बुरा लगता है जब अपनी बात कहकर किसी के चेहरे पर चुप्पी पढ़ना चाहो और वो शब्दों की चाशनी से शरीर को ऐंठ दे। चाही गई एक चुप्पी को छोड़कर सब दे देने वालों पर कोफ़्त होती है। मैं चुप रहा। ऐसे मन के साथ कोई सुनने के लिए कुछ नहीं कहता बस सामने वाला समझ रहा है इसके लिए कहता है। मन भाग रहा पर पाँव बँधे हैं। मोह बांध रहा और मोहब्बत बैचेन कर रही। हरे रास्तों पर खुद को भिगोकर बैचेनियों को डुबो देने की हद तक भीगता रहा खुद को हँसाते हुए।





बैचेनियाँ डूबने लगी तो शरीर बीमार पड़ गया। अपने शहर से जो कशीदे समेटे थे यों ही बिखरे रह गए। कशीदे उनके लिए जिन्हें देखकर शरीर काम्पता। उनसे कितना दूर रखा खुद को। शायद खुद को किसी के लिए बचाकर रखने के मोह में पास आने की कोशिशों को रोके रखा। हाँ भी तब करता जब लगता कि अब अंधेरा सारे दरवाजे बंद कर चुका है। तब चिढ़ाने के लिए हरियल रास्तों के सपने दिखाता। तड़प को मार दिया था किसी की और अब कशीदे देकर खुद उस गिल्ट से मुक्त होने का सामान इकट्ठा करता था। कम से कम अब इतनी दूरियाँ थीं कि पास आने का कोई सीधा रास्ता बचानहीं रह गया था।
सुबह बस की खिड़की पर धुंध छंटी तो बौछारों में भीगते हुए हँस रहा था। दिन कैसे कटता। भाग गया दूर किसी दमक में। बैचेनियाँ काट लेने भर के लिए। कोई फिर पकड़ कर ले आए उन रास्तों पर जिनसे मोहब्बत हो गई। वो जगहें जैसे दरवाज़े बंद कर रही हों। और फिर शाम आती है तो लगता है जैसे खुद के होने को कहीं छोड़ दिया। सिर्फ चेहरा है और आवाज़। कोई कुछ भी नहीं। ज़ी करता है आँखें बंद करके सुनता जाऊं। परदा जो दिखा रहा है दिमाग उसके साथ-साथ दृश्यों में घुलकर कहीं और चला जाता है।



तीन बरस पहले किसी शाम सपना देखते हुए कैसे एक नाम अटक गया था। वो नाम जो जन्म देने वाली मिट्टी में घुला हुआ था। शाम भर तस्वीरें देखता रहा। नज़दीक आने के रास्तों पर चलता गया। और रास्ते छोटे होते गए। चाह की पगडंडियों पर बाधाएँ आती गईं और नजदीकियों के रास्ते पास आते गए। इतने पास आते गए कि खुद के ना होने पर भी होंठ नाम लेते रहते। इतनी नज़दीकियाँ कि जिस शहर को जी भर कोसा वो शहर प्यार हो गया। और फिर लगता कि मुझे ही कोई मुझसे छीन रहा हो। भागते पेड़ों के बीच जैसे मैं बिखरकर इधर-उधर गिर रहा होऊं। कितने नाम हैं जाने-पहचाने कि जिन के साथ दिन सुहाने और रातें रंगीन होती हैं। डर लग रहा है सबसे। जवाब देते नहीं बनता कि मैं हूं इस शहर में।

बस पड़े रहना चाहता हूं उन दो चेहरों के पास जो गोद में खेलते हुए चेहरे बने हैं। वो कुछ भी नहीं पूछते इस सवाल के अलावा कि आप भूखे तो नहीं। मैं हँस देता हूँ जवाब देते हुए, मुझे कब भूख लगती है। रात होते-होते बैचेनियाँ पाँवों में नाचने लगती है। मैं स्टेशन मास्टर के कमरे के आगे रखी कुर्सी पर बैठे सिगरेट के धूँए के पटरियों की तरफ जाते हुए देखता रहता हूं। फाटक बंद होता है तो पैदल चलने वाले थोड़ा सा झुकते हैं और निकल जाते हैं, जो सवार होते हैं इंतज़ार करते रहते हैं रास्ता खुलने का। खत्म हो चुकी सिगरेट को देखकर दूसरी सिगरेट जेब से बाहर आ जाती है। आस या पास कुछ भी नहीं जो जला दे इसे। नीचे पड़ा सिगरेट चमकता है और झुककर दूसरी सिगरेट को चूम लेता है। महीनों पहले कि वो रात जाने कहां से उतर आती है पटरियों पर झूलती हुई। पिगलती बरफ के बीच नशे में झूमते शरीर ने चिपके होठों को दूर करते हुए चाह की थी कि ये भारीपन ना होता तो गले पर प्यारा नीला रंग उभर आता। नशे में ही उसने एक नाम लिया कि ये नीलापन उस पर कितना फबेगा।

पागल हो गया था मन उस रात। दूर अँधेरे में पिघलते हुए पहाड़ को देखते हुए वो रातभर बालकनी पर सिगरेटें झाड़ता रहा। ये नाम क्यों लिया उसने, क्या माथे पर लिखा रह जाता है ज़ेहन में अटका रह गया नाम। नाम ने उतार दिया सारा नशा जो नशे को को काटने के लिए नसों में घुला था। खुद को बचाने के लिए लकीर खींच दी उस रात और भाग आया था फिर किसी के पास आने को नकारकर।

बंद दुकान की सीढ़ीयों के नीचे से सिर निकालकर कुत्ता अजीब सा लुक दे रहा है। सड़क पर ठहरे रह गए पानी में रोडलाइट ऐसे चमक रही है जैसे पूरा चाँद हो। सुनहरी रेखा तक खत्म हो चुकी सिगरेट ने होंठों को जला दिया। पानी में झांकते चाँद के छलावे पर सिगरेट फेंकी तो छप्प की आवाज के साथ चाँद गड्डमड्ड हो गया। बुझा हुआ सिगरेट का टुकड़ा पानी पर तैर रहा है। मन नहीं समझता समझाने पर भी। ऐसे कैसे लौटा जा सकता है। मैं सोचता हूं कि मेरा होना जरूरी है।

कानों में चित्रा सिंह घुलती जाती हैं बैचेनियों में तैरते हुए-

उन के खत की आरज़ू है उन के आमद का ख़याल 
किस क़दर फैला हुआ है कारोबार-ए-इंतज़ार




Saturday, 15 July 2017

समय गठरी होता ना तो बांधकर लाद देते कांधे पर

भीगने के लिए जरूरी थोड़ी होता है कि खूब बारिशें हों। हल्की-हल्की बौछारें भी तो कभी-कभी भिगो देती हैं गहराई तक। काँच के दरवाजे को किसी उम्मीद से हल्का सा धकेलते हुए अंदर पैर रखते हैं तो कमीज पर मंडी बूँदों को देखकर कोई पूछे कि तुम तो भीग गए। तो चेहरे पर मुस्कराहट तैर जाती है, हां मैं भीग गया पूरा।
बैठते हुए आँखें देखी और भीगते-भीगते डूब गया। कुर्सियों के चारों तरफ कितना कुछ मांडा हुआ था। सबमें दिख क्या रहा था वही ना जो देखना था। जो भिगा रहा था। और देखते हुए माथे पर क्या महसूस हो रहा था, बरगद पर से अटकी हुई बूंदें झरकर माथे पर गिर रही हों जैसे।

नदियाँ कितनी दूरी तय करती हैं ना। भीगने के लिए दूरियां क्यों आड़े आएंगी। नदियाँ तो बारिशें नहीं होती ना। बारिशें कभी-कभी मुँह फेर लेती हैं। लेकिन नदियाँ जब भी बहती सब कुछ भिगोते हुए चलती। सड़क के किनारे उन चार पीले पत्थरों के पीछे की जमीन जब भीगती तो कैसे सबकुछ हरा-हरा हो जाता। उन पत्थरों के पास से गुजरती हवा में कैसी नमी होती है। हवा भी नम होती है क्या दुःखांत कहानियों के लिए और वो भी सालों बाद तक। पर नमी में जाने कौनसा सुकून है जो हर वक्त भिगोता रहता है। उन कहानियों का प्रेम शायद हवा में घुला रहा गया था बरसों बाद भी।

जैसे भीगना बचा रह जाता है सालों-साल तक। उजाला खत्म होता है और अंधेरा हँसने लगता है। भीगने की महक कुरदने लगती है कुछ घंटों बाद ही। समय गठरी होता ना तो बांधकर लाद देते कांधे पर और छिड़कते रहते हर महक के साथ छींटे बालों में।

हैरानियाँ होती हैं ना यूँ भीगने पर। कि सब बुनते होंगे कहानियाँ और हँसते होंगे। पर भीगने का जो सुख होता है वो अंधा होता है अगर अंधा नहीं भी होता है तो बन जाता है। सोते-सोते करवट बदलकर बालों में हाथ फिराओ तो भीगने की महक फैल जाती है। होंठों पर हंसी तैर जाती है। और खिड़की से लगता है हवा का झोंका आया हो कोई किसी चश़्मे को छूकर। किसी ज़ादूई चश़्मे को छूकर। ज़ादूई 🌿

Friday, 19 May 2017

यार ये मई का महिना है

यार ये मई का महिना है
दिन तपते हैं ठरती हैं रातें
 सुबह छत पर मोर नाचते हैं
 दोपहर जाळों के नीचे होती हैं गायें
 शाम को उत्तर से उठता है बवंडर।
 यार ये मई का महिना है
 क्यों कहते निर्मम महिना है
 लू और तपत से जलाने वाला
 पसीने से तरबतर कर देने वाला
 उमस और आंधियों का महिना।
 यार ये मई का महिना है 
 मैंने खिड़की में पाँव रखे थे
 बरगद को छूकर आती हवा
जाळों पर उगे लाल-पीले पीलू
 खेजड़ियों से झड़ते खोखे
 टूळों पर लटकते पाके।
 यार ये मई का महिना है
 ये मेरा महिना है
 मैंने खुद को जलाने की चीजें चुनी नहीं
 ना ही पत्थर चुने और ना ही वायरों का हवा-पानी।
 यार ये मई का महिना है
 कपड़े सिली बोतल का पानी पीना है
 डाखणी खिड़की की हवा में सोना है
 शाम को ठाढकी रेत में फिरना है
 ढळती रात में कांगसिया बजाना है।
 यार ये मई का महिना है
 बोला ना मेरा महिना है...

Tuesday, 16 May 2017

हवा के गीतों पर झूमती गेहूँ की बालियाँ

मुझे कविताएं बहुत पसंद है। और उससे भी ज्यादा पसंद है कविताओं को नए तरीके से पढ़ना। छपी हुई कविताओं को पढ़ने से घटती हुई कविताएं महसूस करना ज्यादा सुखदायी होता है। या फिर पढ़ी जा चुकी कविताओं को ही घटते हुए महसूस करना। जैसे मैं किसी निर्माणाधीन इमारत के पास चला जाता हूं और महसूस करता हूं नरेश अग्रवाल की ये कविता-
"तुम हँसते हुए  
काम पर बढ़ोगे
और देखते ही देखते 
यह हँसी फैल जायेगी 
ईंट-रेत और सीमेंट की बोरियों पर 
जिस पर बैठकर 
हंस रहा होगा तुम्हारा मालिक।"





मैं बैठ जाता हूं किसी छोटी सी रेगिस्तानी पहाड़ी पर जाकर केदारनाथ अग्रवाल की इस कविता को समझने और महसूस करने के लिए-

"जहाँ से चली मैं 
जहाँ को गई मैं- 
शहर, गाँव, बस्ती, 
नदी, रेत, निर्जन, 
हरे खेत, पोखर, 
झुलाती चली मैं। 
झुमाती चली मैं! 
हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूं"।


मैं ऐसे ही सुकून भरी कविताओं को महसूस करने के लिए यात्राएं करने के सपने देखता हूं। कोई चुप्प सी यात्रा। बिना कुछ जाने बिना कुछ किसी से पूछे। ऐसी यात्रा जो सिर्फ मेरी यात्रा हो। मेरे महसूस करने को कोई महसूस न कर पाए ऐसी यात्रा।
पिछले दिनों में हिमाचल में था। मई-जून के महिने में हिमाचल जाने का पहला कारण हर किसी का यही होता है वहाँ ठंडक होती है। मैं समूद्र तल से 230 मीटर ऊंची तपती दोपहरों वाली जगह से ठंडी 2100 मीटर ऊंचाई वाली जगह था। जैसलमेर से धर्मकोट तक कि यात्रा में पठानकोट तक 24 घंटे की यात्रा उंघते हुए बीती। और फिर पठानकोट से निकलते-निकलते आँखें खुलनी शुरू हुई जो खोती गई सुंदर कविताओं में। पतली-पतली सड़कें, दोनों तरफ छोटे-छोटे गेंहूं के खेत, ऊंचे पहाड़। मैंने बहुत सारी कविताओं को महसूस किया इस यात्रा में।




इस यात्रा में जो चीज सबसे अच्छी लगी वो थे गेहूँ के खेत। छोटे-छोटे खेतों में लहराती गेहूं की बालियाँ ऐसे लग रही थीं जैसे हवा के गीतों के साथ नाच रही हों। मैं धरमकोट में जिस कमरे में रुका हुआ था उसके ठीक नीचे एक छोटा सा खेत था जिसकी बालियाँ हवा में लहराती रहती थी। मैं सिगरेट पीने बाहर निकलता तो लम्बी देर तक लोहे की जाली पर हाथ टिकाए सुनहरी बालियों को देखता रहता। सीढ़ीदार खेत बहुत छोटे-छोटे होते हैं। मैं रास्ते भर सोचता रहा कि कितने प्यारे हैं ये खेत, मैं भी घर के पास एक ऐसा छोटा सा खेत बना दूंगा जिसमें हमेशा कुछ उगता रहे।








मक्लिओडगंज के पास एक छोटी सी झील है, डल झील। धर्मकोट से इस झील तक पैदल रास्ता बहुत सुंदर है। घने पेड़ों के बीच से गुजरते हुए महसूस होता है जैसे आँखें बंद किए चल रहे हों। चारों तरफ शांति और पेड़ों के बीच से आती झींगूरों की आवाजें। इस रास्ते के बीच में बताया गया कि बीच में एक जगह पहाड़ी कुत्ते हैं ध्यान रखना। इन पेड़ों के बीच से गुजरते हुए जो महसूस हुआ वह मंगलेश डबराल की इस कविता से समझा जा सकता है-
कुछ देर बाद
शुरू होगी आवाज़ें
पहले एक कुत्ता भूँकेगा पास से
कुछ दूर हिनहिनाएगा घोड़ा
बस्ती के पार सियार बोलेंगे
बीच में कहीं होगा झींगुर का बोलना
पत्तों का हिलना
बीच में कहीं होगा
रास्ते पर किसी का अकेले चलना
इन सबसे बाहर
एक बाघ के डुकरने की आवाज़
होगी मेरे गाँव में।






मैंने सुना था हिमाचल के रास्ते डरावने हैं। मुझे इन रास्तों से गुजरते हुए एक बार भी डर नहीं लगा। छोटे-छोटे रास्ते। उन रास्तों पर से चढ़ती-उतरती गाड़ियाँ, ढलानों पर पशुओं को हांकती लड़कियां, रास्तों से बहुत नीचे बसे गाँव। पहाड़ों पर चढ़ते-उतरते हुए हर बार मुझे आँखों देखी फिल्म याद आती रही। मेरा सत्य वही होगा जिसे मैं महसूस करूंगा, कुछ अनुभव अभी भी बाकि हैं जो कि सिर्फ सपनों में भोगे थे। जैसे कि ये सपना मुझे बार-बार आता था कि मैं हवा में तैर रहा हूं पक्षी के जैसे।






यहाँ के लोग भी मुझे किसी कविता से लगे। चुपचाप पना काम करते हुए। आते-जाते हुए। शायद नई जगह के लोग होने के कारण मुझे ऐसा लग रहा है। सड़क पर गुजरते इस बुजूर्ग की तस्वीर देखिए या खच्चर ले जाते इस आदमी को या फिर इस राहगीर को। मुझे लगा कि से पूछूं कौनसे देश से हो पर फिर मन ने कहा कि तुम बिना सवाल-जवाब कि यात्रा के हो तो पूछा नहीं।












दूर तक ऊंचे-ऊंचे हरे और सफेद पहाड़। ऊपर की चोटियों पर गर्मियों में भी बर्फ दिख रही है। पेड़ों की लम्बी कतारों पर सुबह-शाम सूरज डूबने और उगने के रंग उतरते हैं। किसी कोने में कोई अकेला खड़ा पेड़। शाम को छोटी-छोटी चीजें जब सूरज पीछे चला जाता है तो निखरने लगती हैं।









पराशर झील धर्मशाला से छह घंटे की दूरी पर है मंडी के पास। मुझे इस यात्रा में गेहूँ के खेतों के बाद अगर कोई जगह सबसे अच्छी लगी तो वो थी इस झील के पास एक पहाड़ी। यहाँ पराशर ऋषि का मंदिर है। इस झील के अंदर एक छोटा बगीचा है जो तैरता रहता है। मंदिर में स्थानीय लोगों की भीड़ थी शायद यहाँ पर्यटक बहुत कम ही आते होंगे। मंदिर के आस पास लकड़ी से बहुत ही सुंदर कमरे बने हुए हैं। झील देखने के बाद पास की एक पहाड़ी पर चढ़े।वहां एक तार थी जिसके दूसरी तरफ छोटा सा कमरा दिख रहा था। वहाँ की हवा ऐसी थी कि बैठे रहें बस हिलें ही नहीं। दो पहाड़ियों बीच से आती ठंडी हवा और आसपास दिखते सफेद बर्फ से ढके पहाड़। भेड़ों का हांकता चरवाहा, पहाड़ों के बीच गोते खाते पंछी। मेरे लिए ये जगह बिल्कूल वैसी ही थी कि कुछ अनुभव अभी भी बाकि हैं जो कि सिर्फ सपनों में भोगे थे।

















मैं धरमकोट में रुका था। इसे छोटा इजरायल भी कहते हैं। मकलिओडगंज से थोड़ा सा आगे शांत और छोटा सा गांव है। यहाँ से कांगड़ा वैली और धौलाधर रेंज दिखते हैं। भीड़भाड़ से दूर शांति से रहने के लिए धरमकोट बहुत ही प्यारी जगह है। मैं मिस्टिक लोटस होटल में ठहरा था और इस होटल में ज्यादातर ऐसे लोग थे जो तीन-चार महिनों के लिए यहाँ रुकने आए थे। यहाँ रास्तों में अकेले फिरते हुए ऐसे लगता है जैसे हर चीज कविता कह रही हों। पेड़ों के बीच से रोशनी बिखेरता सूरज, पत्थर पर खिलता अकेला फूल, पास में बैठा उबासी लेता कुत्ता, स्कूल में खेलते हुए थककर सीढ़ियों पर बैठे बच्चे।


















मैं फिर से इन तस्वीरों को देखता हूं तो ऐसे लगता है जैसे मेरे किसी प्रिय कवि की कविताएँ हैं जिन्हें मैं बार-बार पढ़ता हूं। इन सामने घटती कविताओं में सुख है महसूस करने का पास बैठकर।